ऋषियों ने निर्गुण के गुण क्यों बताए? || श्वेताश्वतर उपनिषद् पर (2021)

आचार्य प्रशांत: ब्रह्म को किन-किन उपाधियों से इंगित किया गया है, विभूषित किया गया है, कहो जैसे? अनिकेत। अनिकेत कह दिया वहीं से शुरुआत कर लो। तो तुम्हारे सामने दो विकल्प आ रहे हैं, एक विकल्प ऐसा है जो तुमको इस धरती पर ही किसी पार्थिव वस्तु से, व्यक्ति से बाँध देना चाहता है, घरौंदा बना देना चाहता है तुम्हारा; और दूसरा विकल्प है जो तुम्हें बाँध नहीं रहा, जो तुम्हें मुक्ति दे रहा है, तो तुम जान लो कि कौनसा विकल्प तुम्हें ब्रह्म की ओर ले जाएगा। और उपनिषद् हमसे कह रहे हैं, तुम्हारे लिए तो ब्रह्म ही श्रेष्ठ है।
इसी तरीके से ब्रह्म को और क्या कहा गया है? अज्ञेय। कौनसा विकल्प ऐसा है जो तुम्हारे पास तुम्हारे पूर्व संचित ज्ञान के कारण आ रहा है, या तुम्हारे पूर्व संचित अनुभवों के कारण ही आकर्षक लग रहा है? जो विकल्प तुम्हें तुम्हारे पुराने स्मृतिबद्ध ज्ञान के चलते ही आकर्षक लग रहा हो, और वह ज्ञान सिर्फ़ तुम्हें समाज से, शिक्षा से नहीं मिला है, वह ज्ञान तुम्हारे शरीर में भी बैठा हुआ है जो तुम्हारी जैविक पूरी संस्कारिता है उसके रूप में।
तो जो कुछ भी तुम्हें शारीरिक व सामाजिक कारणों से आकर्षक लग रहा हो, वह ब्रह्म जैसा नहीं है। ब्रह्म तो है अज्ञेय, और कोई विकल्प है जो तुम्हें इसलिए बुला रहा है क्योंकि उसके बारे में जो तुम्हारा अनुभव है, या स्मृति है, या कल्पना है, वह बड़ी रोमांचक और आकर्षक पता चल रही है, तो जान जाओ कि यह रास्ता ब्रह्म का नहीं है।
हम अभी चर्चा कर रहे हैं कि ब्रह्म को आधार बनाकर के जीवन में निर्णय और चुनाव कैसे करने हैं। ऋषि हमसे कह रहे हैं 'अगर चाहते हो कि जीवन में तुम्हारे सब निर्णय सही बैठें, तो आधार, क्राइटेरिया (मापदंड) किसको रखो? ब्रह्म को रखो।' बस पूछ लिया करो, यह अभी तीन-चार सामने विकल्प रखे हुए हैं, इनमें से ब्रह्म जैसा कौनसा है।
ब्रह्म के लिए ऐसे ही नाम है 'मुक्त'। क्या नाम है? मुक्त। देख लो कौनसा विकल्प ऐसा है जो तुम्हारे बंधनों से तुमको दूर ले जाएगा, कौनसा विकल्प ऐसा है जो तुम्हारे ऊपर नयी बेड़ियाँ बनकर चढ़ जाएगा। जैसे दिखाई दे कि अभी एक ऐसा विकल्प बुला रहा है जो जीवन में नई बेड़ियाँ ही लाने वाला है, हर तरीके से - मानसिक, आर्थिक, शारीरिक, तो समझ जाओ कि यह तो ब्रह्म वाला रास्ता नहीं है। और ऋषि महाराज बोल गए थे 'तुम्हारे लिए तो बच्चा ब्रह्म ही श्रेष्ठ है।' तो तुरंत अस्वीकार कर दो उसको जो श्रेष्ठ नहीं है।
