बस दो विकल्प होते हैं - दुःख या ब्रह्म || श्वेताश्वतर उपनिषद् पर (2021)

ततो यदुत्तरतरं तदरूपमनामयम्। य एतद्विदुरमृतास्ते भवन्त्यथेतरे दुःखमेवापियन्ति॥
जो उस (हिरण्यगर्भ रूप) से श्रेष्ठ है, वह परब्रह्म परमात्मा रूप है और दुखों से परे है, जो विद्वान उसे जानते हैं, वह अमर हो जाते हैं, इस ज्ञान से रहित अनन्य लोग दुःख को प्राप्त होते हैं।
~ श्वेताश्वतर उपनिषद् (अध्याय ३, श्लोक १०)
आचार्य प्रशांत: दुःख क्या है?
सीधी सी परिभाषा समझ लो। जो तुम वास्तव में चाहते हो उसका ना प्राप्त होना ही दुःख है। जो तुम्हारी कामना है असली, उसकी आप्राप्ति का नाम ही दुःख है। ग़ौर से समझना, तुम्हारी असली कामना की अप्राप्ति का नाम ही दुःख है।
असली कामना अप्राप्त क्यों रह गई?
नकली कामना प्राप्त हो गई। जब नकली कामना प्राप्त हुई तो बहुत सारा क्या मिला? सुख। तो दुःख अकेला नहीं मिलता किसी को, जिसको दुःख मिला उसे साथ में सुख भी मिला है। बस यह जो दुःख है, यह थोड़ा असली है ज़्यादा, और जो सुख है वह थोड़ा नकली है ज़्यादा।
