कभी कुछ समझ से चाहो तो! || श्वेताश्वतर उपनिषद् पर (2021)

वेदाहमेतं पुरुषं महान्तमादित्यवर्णं तमसः परस्तात्। तमेव विदित्वाति मृत्युमेति नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय॥
मैं इस अविद्यारूप तमस से दूर उस प्रकाशमय आदित्य स्वरुप परमात्मा को जानता हूँ, उसे जानकर ही विद्वान मृत्यु के चक्र को पार कर सकता है, अमरत्व प्राप्ति के लिए इसके अतिरिक्त कोई अन्य मार्ग नहीं।
~ श्वेताश्वतर उपनिषद् (अध्याय ३, श्लोक ८)
आचार्य प्रशांत: पिछले श्लोक का ही भाव इस श्लोक में भी परिलक्षित होता है। "मैं इस अविद्यारूप तमस से दूर उस प्रकाशमय आदित्य स्वरुप परमात्मा को जानता हूँ।" अब जैसा कि हमने पहले भी कहा कि ये बात तो उपनिषदों की मूल शिक्षा, वेदांत के मूल सिद्धांत के ही विरुद्ध जाती है कि परमात्मा को जाना जा सकता है। परमात्मा क्या है? अज्ञेय। उसको जाना नहीं जा सकता।
तो फिर क्या कहा गया है? सूत्र बिलकुल आरम्भ में ही छुपा हुआ है – "मैं इस अविद्यारूप तमस से दूर" बस, बात इतनी। 'इससे दूर हो गया मैं, इससे दूर हो गया मैं, इतना काफ़ी है।' तो फिर आप पूछिए कि ये फिर जो आगे की बात है, वो जोड़ी क्यों गई है? जोड़ी इसलिए गई है क्योंकि मन मानता नहीं है जब तक हाथ में कुछ आ ना जाए। शुरू में इतना ही कह दिया, "इस अविद्यारूप तमस से दूर होना है।" अविद्या का अहंकार है ये संसार, इससे दूर होना है, इतना ही भर बोलोगे अहंकार को तो वो बिलकुल तड़प जाता है। वो बोलता है 'अरे! संसार ही तो है मेरे पास, ये भी छीने ले रहे हो, तो मिलेगा क्या?'
अब जो कुछ मिलेगा, वो अभी जो है उसको छोड़कर के मिलेगा, पहले से कैसे बता दें? और जहाँ तुमने अभी जो है उसको छोड़ा, तहाँ तुम वो रह नहीं जाओगे जिसे कुछ पाने की आकांक्षा हो। मामला समझो। अभी तुम्हारे पास बहुत कुछ है, और जो कुछ तुम्हारे पास है वो तुम्हारे पास नहीं है, उसी से तुम्हारा निर्माण हुआ है। तुम पूछ रहे हो कि 'मैं ये सब छोड़ दूँगा, चलिए साहब, आप बता रहे हैं कि ये संसार यूँ ही है, अविद्यारूप तमस है; मैं इसको छोड़ दूँगा। लेकिन ये तो बता दीजिए, लाभ क्या होगा?'
