सत्य का निरंतर अभ्यास कैसे करें? || योगवासिष्ठ सार पर (2018)

असली सत्य को यदि तुम जान भी गए हो तो भी तुम्हें निरंतर अभ्यास करना पड़ेगा। कटक फल शब्द के उच्चारण से पानी साफ़ नहीं हो जाता। —योगवासिष्ठ सार
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, निरंतर अभ्यास से क्या अभिप्राय है?
आचार्य प्रशांत: दो बातें हैं जिन्हें ठीक-ठीक समझ लेना बहुत ज़रूरी है। पहली बात यही कि समस्त ज्ञान, समस्त आध्यात्मिकता का उद्देश्य आपको कुछ जनवा देना इत्यादि नहीं है, आपमें कोई भावना संचारित कर देना भी नहीं है, आपको किसी विशेष मानसिक स्थिति में ले जाना भी नहीं है, उद्देश्य मात्र एक है: आपकी ज़िन्दगी को बेहतर बनाना।
जीवन के उत्थान के अलावा आध्यात्मिकता का कोई उद्देश्य नहीं है।
आपने जो कुछ भी ज्ञान इकट्ठा करा है, जो कुछ भी आप मानसिक रूप से, भौतिक रूप से, बौद्धिक रूप से जान गए हैं, अगर वो आपके जीवन में नहीं परिलक्षित नहीं हो रहा, तो पूर्णतया व्यर्थ है। और आपके जीवन में जो कुछ भी परिलक्षित हो रहा है, वह आपका वो ज्ञान है जिससे आप आज़ादी नहीं प्राप्त कर पा रहे।
एक तो वो ज्ञान होता है जिसका हम दावा करते हैं कि हम जानते हैं और दूसरा वो ज्ञान होता है जिसका हम बहुधा दावा नहीं करते, पर जिसको हम न सिर्फ जानते हैं बल्कि जिसमें हमारा बड़ा ज़िद्दी और गहरा विश्वास होता है। हमारा जीवन ऊपरी ज्ञान से नहीं चलता, हमारा जीवन हमारे गहरे ज्ञान से चल रहा है। ये जो गहरा ज्ञान है, ये भी बहुत गहरा नहीं है, पर यह जो उथला ज्ञान है, उसकी अपेक्षा तो गहरा है ही। आत्मा नहीं है ये, लेकिन चैतन्य मन से ज़्यादा गहरा है, ये हमारे जीवन को संचालित करता है।

