मनीषियों का साथ, आवृत वृत्तियों का त्याग, आत्म जिज्ञासा और श्वास का नियंत्रण — ये मनोविजय के साधन हैं। —योगवासिष्ठ सार
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, प्रणाम। श्वास के नियंत्रण से और आवृत वृत्तियों के त्याग से क्या अभिप्राय है?
आचार्य प्रशांत: समझेंगे बात को। आवृत वृत्तियाँ और श्वास का नियंत्रण, इन दोनों को एक में ही समझ लेते हैं। वृत्ति का काम होता है मन में, शरीर में एक आरंभिक संवेग उठाना – पहली लहर। वृत्ति का काम होता है: पहली लहर पैदा करना।
वृत्ति जब तक मौजूद है तब तक पहली लहर तो पैदा होती ही रहेगी। पहली लहर को पैदा होने के कारण बहुत मिल जाते हैं। बाहर से कुछ दिखाई दिया, लहर उठ जाएगी। विचारों की श्रंखला घूमते-घूमते किसी संवेदनशील बिंदु पर पहुँच गयी, लहर उठ जाएगी।
बिस्तर खरीदने गए थे, बिस्तर की लकड़ी देखकर चिता का ख़याल आ गया, उस पर अपनी लाश दिख गई, लहर उठ जाएगी—वो पहली, आरंभिक लहर होती है। जब तक वृत्ति का बीज मौजूद है, आप उस बारे में विशेष कुछ कर नहीं सकते।
सामने से सुन्दर स्त्री गुज़र गई, लहर उठ जाएगी। वो पहली होती है, आरंभिक। चूँकि वो आरंभिक होती है इसीलिए उसमें विशेष बल नहीं होता। ध्यान दीजिएगा, पहली के साथ दुर्भाग्य ये है कि उस पर आपका कोई नियंत्रण नहीं होता। आपको पता भी नहीं चलेगा कि वो क्यों उठ गई। और पहली के साथ सौभाग्य ये है कि उसमें कोई विशेष बल नहीं होता।


