वक्ता: आपको शायद ऐसा लग रहा है कि बातचीत करके आप एक-दुसरे को समझ रहे हो पर असल में बातचीत करके आपने आयोजन करा है एक-दुसरे से दूर रहने का। करके देखिएगा—किसी के साथ भी सामने बैठ जाईए और चुप हो जाईए, तो कैसी हालत ख़राब होती है। बोलना शुरू कर दीजिये तो सब बढ़िया है; आप आ गए बिलकुल समाज के दाएरे में, आप सभ्य हो गईं हैं और आप बात शुरू कर देंगी कि, “मैं ऐसे दफ्तर में काम करती हूँ और वहाँ यह सब होता है, वो अपना किस्सा सुनाना शुरू कर देंगी।”
नकाब ने नकाब से बात-चीत शुरू कर दी।
हम इसीलिए बात करते हैं कि कहीं प्यार न हो जाए, तो बात कर लो; अच्छा तरीका है। कहीं मिलना न हो जाए इसीलिए शब्दों का इस्तेमाल कर लो। कहीं मौन न आ जाए इसीलिए बकवास शुरू कर दो। और मैं सिर्फ यह होठों वाले शब्दों की बात नहीं कर रहा मैं मन के शोर की भी बात कर रहा हूँ। वो भी इसीलिए होती है।
दुसरे ‘व्यक्ति’ से मिलन न हो जाए इसके लिए शब्द हैं और परम से ही मिलन न हो जाए तो उसके लिए विचार हैं। दोनों का उद्देश्य एक ही है कि कहीं मिलन न हो जाए।
मिलन में अहंकार बेचारे हो हटना पड़ता है ।
श्रोता १: अगर हम किसी की मदद करना चाहते हैं, उसे कुछ समझाना चाहते हैं आप कुछ बोलो और सामने वाला सुने उसके लिए उसमें भी तो कुछ ग्रहणशीलता होनी चाहियें

