श्रोता: सर, अप्प दीपो भव के कई अभ्यंश समाज में काफ़ी प्रचलित हैं जैसे दूसरों की मत सुनो दिल की सुनो, पॉवर ऑफ़ कॉनसीय्स काफ़ी प्रचलित हैं यह, इनसे कैसे बचें?
वक्ता: ये जो बातें प्रचलित हैं कि लोगों की मत सुनो अपनी सुनो इत्यादि इन्हीं से मुक्त करने के लिए गुरु तुम्हें अपने पास बुलाता है। यह जो कुछ भी प्रचलित है वो वास्तव में तुम्हें आनंद नहीं देता। तुम जान पाते ही नहीं कि तुम व्यथित क्यों हो? तब स्वभाव होता है तुम्हारा जो तुम्हें बुलाता है, वही घटना स्थूल रूप से गुरु का शिष्य को आमंत्रण बन जाती है। शिष्य है जो फंसा हुआ है इन धारणाओं में वो कहता है, “अपने मुताबिक़ चल लूँगा, स्वयं सोच लूँगा।” बात सिद्धांत के तल पर बिल्कुल ठीक है, अपने हिसाब से चलना चाहिए, अपने मुताबिक जीना चाहिए; पर तब अपने अनुसार चलना चाहिए न जब अपने का कुछ पता हो। जिसको अभी अपने का कुछ पता ही नहीं वो यदि कहेगा कि “मैं अपने अनुसार चल रहा हूँ” तो वो चल तो समाज के अनुसार ही रहा होगा ना?
तुम कहते तो हो कि “देखिए, हमे हमारा रास्ता ख़ुद निर्धारित करने दीजिए, हम देखेंगे कि हमे कैसे जीना है।” पर तुम इतना तो बता दो कि तुम जैसे जी रहे हो उसमे तुम्हारा है कितना? तुम पूरे तरीके से दूसरों से भरे हुए हो, तुम्हारा कुछ भी, मौलिक, असली नहीं है, नकली पर तुमने असली की मोहर लगा रखी है, जो दूसरों का है उसे तुम अपना समझते हो। और गुरु जब तुमसे इन सब चीज़ों को छुड़ाना चाहता है जो नकली हैं, तो तुम्हें क्रोध आता है, तुम विद्रोह करते हो यह कह कर के कि “तुमसे तुम्हारी निजता छीनी जा रही है” और तुम इतना ही नहीं कहते कि तुमसे तुम्हारी निजता छीनी जा रही है तुम यह भी कहते हो कि “तुम्हारे ऊपर कुछ ऐसा आरोपित किया जा रहा है जो तुम्हारा नहीं है।”
तुम कहते हो, “देखिए हमें हमारे मन की करने की आज़ादी नहीं दी जा रही है, हमारे ऊपर एक बाहरी व्यवस्था लादी जा रही है। हम क्यों माने किसी की बात? हम क्यों चले किसी और के दिये नियम-कानूनों पर? हमें हमारी करने दो ना।” तुमने कभी गौर किया है कि तुम जिसे कहते हो कि तुम्हारी करने दो, वो है क्या? उसमें तुम्हारा है कितना? तुम कहते हो “नहीं नहीं मुझे मेरे मुताबिक़ नौकरी करने दो, मुझे मत बताओ कि क्या सही, क्या गलत।” ठीक है नहीं बताएंगे, पर तुम यह बता दो कि अगर तुमको सामाजिक पट्टी न पढ़ाई होती, तो तुम्हें यह पता भी होता कि नौकरी जैसी कोई चीज़ होती है? और यदि तुम किसी दूसरे समाज में होते जहाँ तुम्हें दूसरे तरीके से संस्कारित कर दिया होता, तो क्या तुम इसी तरीके से और इन्हीं नौकरियों के पीछे भागते?


