श्रोता: सर, जैसा कि आपने कहा कि हमारी अनिवार्य ज़रूरतें तो प्राकृतिक रूप से पूरी हो ही जाती हैं, तो मैं ये जानना चाहती हूँ कि जब हम किसी भी महानगर में प्रवेश करते हैं, तो हमें बहुत से लोग दिखाई देते हैं, जो सड़कों पर भीख मांग रहे होते हैं। तो क्या उन लोगों की अनिवार्य ज़रूरतें प्राकृतिक रूप से पूरी नहीं होती?
वक्ता: क्या उनकी ज़रूरतें वाकई प्राकृतिक हैं? उन लोगों को महानगरों में आने की ही क्या ज़रूरत है, उनके लिए तो जंगल ही बहुत हैं। वह लोग उन जंगलों में क्यों नहीं चले जाते?
श्रोता: सर, क्योंकि शायद वो इन्हीं महानगरों की गलियों में पैदा होते हैं, तो उन्हें और कुछ का पता भी नहीं होता होगा।
वक्ता: क्या तुम जानते हो कि यह लोग, जो सड़क पर भीख मांगते हैं, यह लोग गाँव के एक साधारण आदमी से ज़्यादा कमाते हैं? यह उनकी अनिवार्य ज़रूरतें नहीं हैं, जो उनसे भीख मंगवाती हैं बल्कि यह तो महानगरों की चकाचौंध है, जो उन्हें यहाँ खींचती है। और जिन बच्चों को दिखाकर यह तुम से ज़्यादा से ज़्यादा भीख बटोरते हैं, उनमें से ज़्यादातर बच्चे किसी न किसी तरह के नशे के आदि होते हैं। तो यह सब अनिवार्य ज़रूरतें पूरा करने के लिए नहीं हैं बल्कि यह तो आशुरचना है अपनी इच्छाओं को पूरा करने के लिए।
श्रोता: सही बात है, नहीं तो हमें महानगरों में और पर्यटक स्थलों पर इतने सारे भिखारी नहीं मिलते।

