कर्माणि कतिविधानि सन्तीति चेत् आगामिसञ्चितप्रारब्धभेदेन त्रिविधानि सन्ति। ~तत्वबोध
कर्म कितने प्रकार के होते हैं? आगामी, संचित और प्रारब्ध - तीन प्रकार के होते हैं।
ज्ञानोत्पत्त्यनन्तरं ज्ञानिदेहकृतं पुण्यपापरूपं कर्म यदस्ति तदागामीत्यभिधीयते । ~तत्वबोध
ज्ञान की उत्पत्ति के पश्चात ज्ञानी के शरीर के द्वारा जो पाप-पुण्य रूप कर्म होते हैं, वे आगामी कर्म के नाम से जाने जाते हैं।
अनन्तकोटिजन्मनां बीजभूतं सत् यत्कर्मजातं पूर्वार्जितं तिष्ठति तत् सञ्चितं ज्ञेयम् । ~तत्वबोध
अनंत कोटि जन्म में पूर्व में अर्जित किए हुए कर्म, जो बीज रूप से स्थित हैं, उसे संचित कर्म जानें।
इदं शरीरमुत्पाद्य इह लोके एवं सुखदु:खादिप्रदं यत्कर्म तत्प्रारब्धं भोगेन नष्टं भवति प्रारब्धकर्मणा भोगादेव क्षय इति।



