सभना गला समरथु सुआमी सो किउ मनहु विसारे*∼ पौड़ी : अनंदु साहिब, नितनेम ∼*
अनुवाद: हमारे परमपिता सर्वसामर्थ्यवान हैं प्रत्येक कर्म करने के लिए तो क्यों हम मन से उन्हें भूल जाते हैं?
वक्ता : सभना गला समरथु सुआमी सो किउ मनहु विसारे
किउ विसारे। क्यों विस्मृति में जाते हो ? “सभना गला समरतु सुआमी सो क्यू विसारे।”उस समर्थ स्वामी को क्यों विसारते हो।
अमनदीप (श्रोता) ने यह पुछा है कि गुरुद्वारों में, मंदिरों में लोग लगातार उसका नाम ही ले रहे हैं, इससे उनको कुछ मिलता तो दिखाई देता नहीं, तो ये तो बस एक विधि है, नाम लेना, जपना। उसके नाम की फिर महत्वता क्या है?
कहा क्या जा रह है-‘क्यू विसारे’। मुंह याद रखेगा क्या, अगर मुंह से जप रहे हो तो? जप क्या है? होंठ का चलाना? सुमृति क्या है? नाम लेना बार-बार कोई? किन्ही शब्दों का उच्चारण, ये है?
आत्म-पूजा उपनिषद ने क्या कहा था? जप क्या है?‘निश्चलं आसनं ज्ञानम्’उस जगह पर निश्चल हो करके बैठ जाना । बस यही तो है। किसका बैठ जाना शरीर का? मुँह का रटना?


