‘वह’ भय [भगवान] अनुस्मारक ध्यान को उपलब्ध होगा, लेकिन रोगी इसेसे बचना चाहेगा।
जो सबसे बड़ी आग में प्रवेश करते हैं, जहाँ वे न तो मर जाते हैं और न ही जीते हैं।।
~ सबसे ऊँचा
(अल-आ’आला)
(क़ुरान ८७,९:१९)
चेतावनियाँ, पुकार, आहटें सबको आएँगी, लेकिन जो रोगी मन है वो क्या करेगा, अपना मुँह फेर लेगा। लेकिन जो प्रेमी मन है, वो क्या करेगा? वो सुनेगा और चलेगा, वही कहा जा रहा है। तुम्हें अगर कोई भी तकलीफ है, दिक्कत है तो इस कारण नहीं है कि अस्तित्व तुम्हें तकलीफ देना चाहता है। कोई साजिश नहीं हो रही है, किसी की कोई उत्सुकता नहीं है तुम्हें तकलीफ देने की।
एक बड़ी ख़ूबसूरत बात कही गई है! धर्मो रक्षति रक्षितः। जिसके मन में धर्म रक्षित है, उसकी अपने आप रक्षा हो जाती है। यदि तुम्हारी रक्षा नहीं हो रही है ‘कष्टों’ से, ‘मुसीबतों’ से, ‘भय’ से, तो कारण सीधा है! क्या? तुम धर्म भ्रष्ट हो गए हो। जब उसकी पुकार आएगी तो वो ऐसा अभिनय करेंगे, जैसे उन्होंने सुनी ही नहीं! वो कानों में रुई डाल लेंगे।


