वक्ता: शिक़ायत करने में एक बहुत बड़ा सुकून है| शिक़ायतें करना हमारा स्वभाव बन चुका है| यह मानना कि परिस्थितियों ने, समाज ने, पूरी दुनिया ने हमारे साथ कुछ ग़लत किया है, यह कह कर हम अपने आप को बड़ा ढांढस बंधा लेतें हैं| क्योंकि हम जब ये शिक़ायत करतें हैं कि हम शोषित हैं, तब हम यह भी कहते हैं कि पूरी दुनिया से अब हम कुछ छीन भी सकते हैं, क्योंकि हमारे साथ ग़लत किया गया है|
लेकिन हम अगर थोड़ा रुककर उन चीज़ों की ओर देखें जो हमें उपहार स्वरुप मिलीं हैं, सिर्फ़ भेंट हैं, जिनके लिए शायद जो योग्यता या पात्रता चाहिए वो हम में थीं भीं नहीं, तो हम पायेंगे कि बहुत सी जो महत्वपूर्ण चीज़ें हैं, वो तो हमको भेंट में हीं मिलीं हुईं हैं| तब हम शिक़ायत कम कर पायेंगे, और हम पायेंगे कि हम ज़्यादा प्रसन्न हैं और मुस्कुरा सकते हैं|
(दिनांक २४ मार्च, २०१०)
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वक्ता: ये बात अविश्वसनीय है ना? हमने कोई पात्रता नहीं दिखाई, हमने कोई कीमत नहीं अदा की है, फिर भी एक स्रोत है जहाँ से सब मिल सकता है| हमारे ‘हाँ’ करने की देर है|
श्रोता १३: ये तो बड़ी लालच वाली बात हो गई?
वक्ता: तुम कर लो लालच| कोई दिक्कत नहीं है| जैसे हमने कहा ना कि तुम्हें लक्ष्य बनाना है, गोल बनाना है, तुम बना लो, पर फिर परम लक्ष्य बनाओ| तुम्हें लालच करना है ना? तो परम लालची हो जाओ|


