“गावनी तुधनो चितु गुपतु लिखि
जाणनि लिखि लिखि धरमु बीचारे”
रहससि साहिब (नितनेम)
वक्ता: नानक कह रहे हैं कि जो कौन्शिअस (सचेत) मन होता है, – विचारशील मन – वो दृश्यों में और ध्वनियों में चलता है। तो उसको उनहोंने इंगित किया है ‘चित्र’ से। और जो छुपा हुआ मन है – सब्कौन्शिअस (अवचेतन) मन, जहाँ वृत्तियाँ निवास करती हैं – वहाँ जो रहता है वो पता नहीं चलता। हमें ही नहीं पता होता, ‘हमें’ माने विचार को, विचार को ही नहीं पता होता कि उसके नीचे कौन सी वृत्ति है, तो उसको उनहोंने गुप्त नाम दिया है, छिपा हुआ।
तो यमराज के जो मुंशी जी हैं- ‘चित्रगुप्त’, जो रेकॉर्ड कीपिंग करते हैं सारी…
श्रोता १: तो सर इसका मतलब यही मन कौन्शिअस भी है और यही मन अन्कौन्शिअस भी है?
वक्ता: वो तो है ही, वो तो हम जानते ही हैं। क्या आपको पता है सब कुछ जो मन में दबा हुआ है, छुपा हुआ है? हज़ारों लाखों वर्षों के जो अनुभव, या पिछले बीस-साल के ही जो अनुभव हैं आपके, वो आपको पता है क्या-क्या थे, और कहाँ से क्या गाँठ बंध गयी है? उसको वो गुप्त कह रहे हैं। तो जो आम मान्यता है कि हमारे एक–एक कर्म का लेखा–जोखा रखा जा रहा है चित्रगुप्त के द्वारा, उस पर टिपण्णी करी है कि लेखा-जोखा रखने वाला कर्म का हिसाब रखने वाला कोई और नहीं है। आपके एक-एक कर्म को देखने वाला और उसको अंकित कर लेने वाला आपका ही मन है।


