आचार्य प्रशांत: हमने बहुत बातें करी हैं तीन दिन में, लेकिन देखिए, कैसे कहूँ? क्योंकि इतनी बार कहा है इसीलिए, कैसे कहूँ? बार-बार कहा है, हर बार कहा है, ज़िन्दगी कैसी है? सब कुछ इस पर। जब निर्णय की घड़ी आती है तब निर्णय किधर को करते हो? सब कुछ इस पर। आज मैं कह रहा था सुबह कि रामकृष्ण बोल गए थे कि आदमी को दो ही चीज़ें लुभाती हैं, डिगाती हैं, कंचन और कामिनी; कंचन माने सोना, कामिनी माने स्त्री। उसमें मैंने रिश्ते और जोड़ दिया है, कामिनी माने स्त्री ही क्यों माने? अगर स्त्री है तो फिर उसको डिगाता है पुरुष, और पुरुष ही भर नहीं डिगाता, बच्चे भी होते हैं, तमाम और नात-रिश्तेदार भी होते हैं। तो ले-देकर दो ही चीज़ें होती हैं जो आदमी को पकड़े रहती हैं, कंचन और रिश्ते; कामिनी को हम थोड़ा व्यापक करे देते हैं, हम बोलेंगे रिश्ते। कंचन वो जो मन को आकर्षित करे, देह को कंचन नहीं चाहिए, देह को कंचन से कुछ मिलता है क्या? देह खाएगी क्या कंचन को? कंचन क्या जो?
श्रोतागण: जो मन को आकर्षित करे।
आचार्य: और कामिनी क्या? जिससे देह का रिश्ता हो। तो माँ से, बाप से, बच्चों से, पति से, पत्नी से इन सबसे क्या होता है? देह का रिश्ता होता है न? तो इन्हीं दोनों चीज़ों में आदमी अटका रहता है, मन में और तन में। तन को जो आकर्षित करे उसको क्या नाम दिया गया? कामिनी या रिश्ता, और मन को जो आकर्षित करे उसको क्या नाम दिया गया? कंचन। तो सारा खेल बस इस बात का है कि जब निर्णय लेने की घड़ी आती है तो कंचन-कामिनी की तरफ निर्णय लेते हो या सत्य की ओर, धर्म की ओर? इसके अलावा तो और कोई बात होती ही नहीं, और जीवन पग-पग पर हमसे फैसले माँगता है, तो बताओ तुम किसकी ओर फैसला कर रहे हो? कंचन-कामिनी की ओर या धर्म की ओर? बस यही बात है, और तो कोई बात ही नहीं।
प्रश्नकर्ता: हमें लगता है कि गुरु के हाथ में हैं मोह-माया से दो मिनट में निकाल देना और वापस डाल देना।




