जिस प्रकार हवा से पैदा की गई आग उसी हवा से बुझ जाती है, उसी प्रकार जो कल्पना से पैदा हुआ है, वो कल्पना मात्र से ही मिटाया जा सकता है। —योगवासिष्ठ सार
आचार्य प्रशांत: चिंगारी को ज़रा हवा देते हैं तो आग भड़क जाती है और चिंगारी को फूँक देते हैं तो आग बुझ जाती है। दोनों ही स्थितियों में काम किसने किया? हवा ने किया। तो उसका दृष्टान्त बनाया है।
जो कल्पना से आया है, उसे कल्पना मात्र से ही मिटाया जा सकता है। आज जितनी हमने बातें की हैं, वो सारी बातें आ करके इस दृष्टान्त में समा जाती हैं। ये हमें बता रहा है कि कल्पना और कल्पना में भेद होता है। बात यह नहीं है कि तुम कल्पना कर रहे हो कि नहीं, बात यह है कि किस केंद्र से कर रहे हो।
हवा और हवा में अंतर है। एक हवा आग लगा देगी, दूजी हवा आग बुझा देगी। विचार और विचार में अंतर है, बुद्धि और बुद्धि में अंतर है, मन और मन में अंतर है।
बहुत मिलते हैं जो कहते हैं कि किसी तरीके से निर्विचार दे दें। मैं कहता हूँ, ये कुविचार है। तुम तो यह मनाओ कि तुम्हारा कुविचार सुविचार में बदल जाए। तुम यह जो निर्विचार माँग रहे हो, यह कुविचार है। तुम तो यह माँगो कि विचार पर आत्मा का वरदहस्त रहे।
जब विचार आत्मा को छुए रहता है तो वो सुविचार होता है। जब विचार आत्मा से दूरी बनाए है, सत्य से, गुरु से दूरी बनाए है, तो वो कुविचार है।


