जो पकड़ेगा वो गँवायेगा || आचार्य प्रशांत, जीसस क्राइस्ट पर (2014)

द लास्ट शाल बी फर्स्ट, एंड द फर्स्ट लास्ट फॉर मानी बी कॉल्ड बट फ्यू चोज़न।
(मैथ्यू.XX.16)
वक्ता: नियति सबकी एक ही है, क्योंकि हम सब एक ही हैं। चूंकि हम में, मूल रूप से कोई अंतर नहीं है, इसीलिए हमारी नियति भी एक ही है। जो हम हैं, वही हम हैं। कुछ और होना, भ्रम है। भ्रम मिट जाना है। समय उसी भ्रम का नाम है। जब तक समय है, तब तक यह भ्रम कायम रहेगा कि हम कुछ और हैं। समय भ्रम है और समय में ही वो भ्रम मिटेगा। तो कहीं पर भी जीसस ये नहीं कह रहे हैं कि कोई ऐसा भी है, जो नहीं पहुंचेगा, पहुंचेंगे सभी। समय का अंतर है, कोई पहले, कोई बाद में। तात्विक दृष्टि से देखा जाए, तो पहले और बाद भी भ्रम ही है। तो असल में सब पहुंचे ही हुए हैं। लेकिन जिनको लग रहा है, अभी वो नहीं पहुंचे हैं, उनके पहुंचने में मात्र समय का अंतर रहेगा। अब सवाल ये उठता है कि किसको समय कम लगेगा और किसको समय ज़्यादा लगेगा? पहले कौन पहुंचेगा, और बाद में कौन पहुंचेगा? उसी का उत्तर जीसस यहां दे रहे हैं।
प्रश्न है, पहले कौन पहुंचेगा और बाद में कौन पहुंचेगा? पहुंचेंगे सभी। पहुंचना हम सब की नियति है क्योंकि पहुंचे हम सब हुए ही हैं। जीसस कह रहे हैं, जो इस जगत में पहला है, वो सबसे अंत में पहुंचेगा। यहां पर जो लोग, कतारों में सबसे आगे खड़े नज़र आते हैं, वो ‘वहां’ की कतार में सबसे पीछे नजर आएंगे।
द फर्स्ट शाल बी लास्ट एंड द लास्ट शाल बी फर्स्ट।
यहां जो सबसे आगे खड़े नज़र आते हैं, कतारों में, उनका ये मानना है कि यही दुनिया है, इसी को जीतना है, इसी में सबसे आगे-आगे भागना है। काश, उन्हें ये पता होता, कि पहुंचना तो उन्हें भी वहीँ है। वो कितना भी आंखे मूंद लें, कितना भी इनकार कर लें कि, ‘’नहीं, ये जो हमें दिखाई पड़ रहा है, ये जो इन्द्रियगत अनुभूतियां हैं, यही आखिरी सत्य है।’’ ये आखिरी सत्य नहीं है, तो नहीं है। उनके इच्छा करने से नहीं हो जाएगा। आखिर में वहीँ पहुंचना है, आखिरी परीक्षा वहीँ देनी है, और उस परीक्षा में सबसे आखिरी नंबर तुम्हारा लगेगा। इस दुनियां में जो सबसे आगे-आगे भागेगा, वो वही है, जो इस दुनिया को ही सच माने बैठा है। वो यही माने बैठा है कि जो आंखों से दिखाई देता है, और जो कानों से सुनाई देता है, उसके अतिरिक्त कुछ है नहीं। वो मूर्ख है। वो भूल ही गया है कि ये दुनिया, एक आधारहीन द्वैत है।मन बना है संसार से, संसार बना है मन से, और वो ये पूछना ही भूल जाता है कि दोनों किससे बने हैं? वो मन और संसार की ही दौड़ में लगा रहता है, और इस दौड़ को जीतता भी रहता है। आगे-आगे चल रहा है।

