आचार्य प्रशांत: जीसस एक जवान आदमी है। एक साधारण से घर में पैदा हुआ है, पेशे से गरेड़िया है; और वास्तव में जवान है। और एक जवान आदमी की सारी आग मौजूद है उसमें।
उत्श्रृंखल-उन्मुक्त घूमता है, छोटी-सी उसकी एक टोली है। इधर-उधर, सड़कों पर घूम-घूम के बजा रहा है लोगों की! जो बात जैसी दिखती है जस-का-तस वैसा बोल देता है।
जो भौतिक, पार्थिव बाप है उसका, उसको लेकर बहुत मज़ा नहीं है उसको, इसलिए कह देता है, “हम तो ‘उसके’ (परमात्मा के) बेटे हैं। कौन इन बापू जी से अपनी पहचान बाँधे! यह पसंद ही नहीं आते हमें! इस जहाँ के हैं ही नहीं हम, क्योंकि इस जहाँ का तो हम जिसको भी देखते हैं, बेड़ियों में जकड़ा हुआ ही देखते हैं। तो यहाँ के नहीं, कहीं और के हैं हम। हम पर नियम-कायदे मत थोपने आना।”
अपनी बात कहनी है उसे। पाँच लोग मिले तो पाँच ही सही, जाकर बैठ जाता है एक टीले पर, और दस-बीस इकट्ठा हो गए तो उनसे भी बोल दिया। जो प्रचलित यहूदी धर्म है, उसको बहुत अहमियत नहीं देता।
यहूदियों के कमांडमेंट्स होते हैं। ‘कमांडमेंट्स’ माने अनुदेश; दस प्रमुख अनुदेश हैं। उनका पालन हीं नही करता।पालन क्या नहीं करता, उनकी धज्जियाँ ही उड़ा देता है। कहता है, “छोड़ो ये पुरानी बातें हैं, मैं नई बताता हूँ। तुम कहाँ पुरानी किताब के चक्कर में पड़े हो, ‘ओल्ड टेस्टामेंट’। हम नई किताब देते हैं, जिसमें पुरानी किताब से आगे बढ़कर कुछ है।”
तो जीसस का जीवन समझ लीजिए नई किताब लिखने में है। जीसस को एक लेखक मान लीजिए, जो कभी लिखता नहीं है; उसका जीवन ही किताब है, उसका बोलना ही किताब है। और वो शुरुआत भी यहीं से करता है कि – “पुरानी किताब ऐसा बोलती थी, पर हम तुम्हें उससे आगे की कुछ बात बताते हैं।”


