आचार्य प्रशांत: सवाल ये है कि, मैंने कहा है कि जो कुछ भी आप तक पहुँच रहा है उसकी असलियत जानिये। उसका सत्य पहचानिए। सतह पर मत रह जाइए। चीज़ वास्तव में क्या है, इस तक जाइए। तो पूछ रही हैं कि ये कैसे हो? डिकोड (समझा) कैसे करें? हम तक तो जो कुछ भी पहुँचता है, वो बड़े छिपे और छद्म रूप में पहुँचता है। वस्तु होती कुछ और है और प्रकट किसी और रूप में होती है। जानें कैसे?
कुछ दो-तीन इसमें बातें हैं, उनको अगर ध्यान में रखें।
पहली, शब्दों से बहुत मतलब मत रखिये। शब्द बड़ा कारगर तरीका होते हैं बात को छुपाने का। आप तक बहुत कुछ शब्दों के माध्याम से पहुँचता है। शब्द बड़े सतही हैं और मैंने कहा कि वो बताने के कम और छुपाने के ज्यादा काम आते हैं। तो ये ताकत विकसित करिए कि आप शब्दों से आगे जा करकें पढ़ सकें और सुन सकें। ये मत देखिये कि क्या कहा गया है। वो कहाँ से आ रहा है ये भी देखिये। यही मत सुनिए कि कानों पर क्या पड़ा, उसके पीछे का मौन भी सुनिये।शब्द हमें बहुत भ्रमित करते हैं। और हम शब्दों के भरोसे बहुत बड़ा हिस्सा जीवन का निकाल दते हैं।
तो शब्दों पर अटकना नहीं हैं। शब्दों से उलझना नहीं है। बहुत महत्व नहीं देना है।
दूसरी चीज़ है रूप, दृश्य – कुछ भी कैसा दिखता है। ये भी हमें बहुत भ्रमित करता है। असल में आप पक्का ही समझें कि जो भी आपको इन्द्रियगत अनुभव हो रहे हैं – दृश्य, रूप, शब्द, स्पर्श, ये सब प्रकट कम करते हैं और आच्छादित ही ज्यादा करते हैं। छुपाने का इनका काम ज़्यादा है। इनके माध्यम से आप कुछ सम्प्रेषित नहीं कर पाएंगे; कोई संवाद नहीं हो पाएगा, कोई स्पष्टता नहीं आ पानी है। रूप आपको बहकाएगा; लिफ़ाफ़े तक अटक कर रह जाएंगे आप। भीतर का सन्देश पढ़ ही नहीं पाएंगे। पर हमारी आतंरिक व्यवस्था कुछ ऐसी है कि हम आँखों से ही देखते हैं और कानों से ही सुनते हैं। आपको देखने का एक अन्य ज़रिया निकालना होगा। क्योंकि जिन्होंने आँखों से देखा, उन्होंने कुछ देखा नहीं और जिन्होंने कानों से सुना, वो कुछ सुन नहीं पाते।


