प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, आपने अपने एक संवाद में कहा है कि व्यक्तित्व की बात हम इसीलिए करते हैं क्योंकि हम मूलतत्त्व से अनभिज्ञ रहते हैं। मेरा प्रश्न है कि – हम दूसरों के मूलतत्त्व को कैसे देखें?
और दूसरा प्रश्न है कि – किसी के मूलतत्त्व को देखने की कोशिश क्यों करें? सिर्फ़ अपने को जानने की कोशिश क्यों न करें?
आचार्य प्रशांत:
ये दोनों साथ-साथ चलते हैं। स्वयं को जाने बिना दूसरे को नहीं जा सकता। जो दूसरे को जान रहा है, वो ‘आत्मज्ञानी’ ही होगा।
दूसरे को जान पाने, देख पाने, समझ पाने में हमसे इसीलिए भूल हो जाती है, क्योंकि हमें ख़ुद का ही कुछ पता नहीं। दूसरे को देख पाने की यदि हममें योग्यता होती, तो हमने उसी योग्यता का उपयोग करके पहले ख़ुद को ही न देख लिया होता?
हमारी हालत ऐसी है कि हम कहें, “अपनी घड़ी में मुझे समय नहीं दिख रहा, आखें ख़राब हैं। ज़रा अपनी कलाई इधर देना। तुम्हारी घड़ी में समय देखूँगा।” उसकी कलाई में समय देख सकते, तो पहले अपनी घड़ी में न देख लिया होता? पर हमारी बड़ी रुचि रहती है दूसरे की सच्चाई जानने में।
प्रश्न भी हम यही करते हैं कि – “दूसरे की पर्सनॅलिटी, दूसरे के व्यक्तित्व के पीछे क्या है, कैसे पता करें?” ये सब जासूसी, और सनसनीखेज


