प्रश्नकर्ता: मैं एक जिला-स्तरीय क्रिकेट खिलाड़ी हूँ। मेरे जीवन में ढर्रे हैं और वो मुझे खेल में आगे बढ़ने से बहुत रोक रहे हैं। तो एक युवा होने के नाते किस तरीके से मैं आगे अनुशासन के साथ इस खेल में उतर सकता हूँ? मैं देश के लिए खेलना चाहता हूँ। कृपया मेरा मार्गदर्शन करें।
आचार्य प्रशांत: देश के लिए खेलना चाहते हो, तो फिर देश के लिए खेलने को ही जीवन बना लो, जीवन में और दूसरी कोई बात बचनी ही नहीं चाहिए।
अस्तित्व का नियम समझो। हंस, हंस के साथ रहता है; कौवा, कौवे के साथ रहता है। शेर और कुत्ते को तुम एक झुंड में घूमता नहीं पाओगे। जिसको बहुत ऊँचे जाना हो वो फिर उस ऊँचे को ही जीवन बना ले। वो ये नहीं कर सकता कि - "एक लक्ष्य तो मेरा ये है कि देश के लिए क्रिकेट खेलना है, राष्ट्रीय टीम का सदस्य बनना है, और दूसरा लक्ष्य मेरा ये है कि वहाँ चौराहे पर मुफ़्त के गोलगप्पे भी खाने हैं।"
अब या तो तुम राष्ट्रीय टीम की ओर देख लो, या फिर तुम ये जो घटिया काम हैं इन्हीं को जीवन में रख लो - दोनों को एक साथ नहीं रख पाओगे। पर हमारी बड़ी ज़िद होती है, बड़ी मूर्खतापूर्ण ज़िद होती है कि हमें तो दोनों चाहिए, ऊँचे-से-ऊँचा भी चाहिए और ये सब जो अंडू-पंडू चीज़ें हमने जीवन में शामिल कर रखी होती हैं, हमें उनको भी रखना है; दोनों को एक साथ नहीं रख पाओगे।
राष्ट्रीय टीम की ओर अगर देखना है तो चौपले के अपने अरमानों को तुम्हें विदा करना पड़ेगा। और चौपला ही तुम्हें बहुत प्यारा है, कि, “वहाँ जाएँगे और वहाँ मेरे ही जैसे पाँच-सात होते हैं, उन्हीं के साथ मूँगफली खाएँगे, गोलगप्पे खाएँगे, एकाध-दो घण्टे गपशप करेंगे।” तो तुम फिर यही कर लो, फिर राष्ट्रीय टीम को भूल जाओ।


