प्रश्नकर्ता: एक बार एक संत से पूछा गया कि, "कर्ता और अकर्ता भाव में अंतर क्या है?” तो उनका उत्तर आया कि, "कर्ता और अकर्ता कोई है ही नहीं।" और अभी आपने बंधनों की बात कही। बंधन मेरे ही हैं और इन बंधनों से छूटना मुझे ही है। इन दोनों में क्या फ़र्क़ है, मुझे समझ नहीं आ रहा।
आचार्य प्रशांत: बस यही बात सही है, इसी को पकड़ लीजिए – आप बंधन में हैं, आपको बंधनों से छूटना है।
प्र: पर कर्ता है ही नहीं तो बंधन किसके लिए हैं?
आचार्य: आपके लिए नहीं है क्या कर्ता? आप तो हैं न कर्ता अपनी दृष्टि में?
प्र: हाँ।
आचार्य: तो फिर क्यों कह रहे हैं कि कर्ता नहीं है? वो मुझे कहने दीजिए। आप क्या कहेंगे?
आप ईमानदारी से अपने जीवन को देखेंगे तो क्या कहेंगे? “मैं सब कामों का कर्ता हूँ।” तो आप कर्ता हैं, और बंधन हैं, और आपको उनसे आज़ाद होना है। बस इतनी-सी बात, इसको पकड़ लीजिए।


