वक्ता: जानो कि तुम जो भी कुछ कह रहो, ‘उसी’ का कह रहे हो, ‘उसी’ को कह रहे हो और ‘उसी’ में कह रहे हो। तुम जब गाय की बात कर रहे हो तो वास्तव में तुम गाय की नहीं ‘उसकी’ बात कर रहे हो| तुम जब यहाँ से इस वस्तु को उठाकर फेंक रहे हो तो तुम इसको नहीं, ‘उसी’ को फेंक रहे हो और ये लगातार होता रहे। ये नहीं कि जब बैठे हो ध्यान में तब तो याद आया कि पेड़ है, कि जानवर है तो ‘वो’ है। ये बात लगातार याद रहे कि जो भी कुछ हो रहा है, कहा जा रहा है, विचार है या कर्म है, कि वस्तु है, सो ‘वही’ है |
‘आखि आखि रहे लिव लाइ’
तुम ‘वही’ हो, ‘उसी’ में डूबे हो, यह याद, यह बोध लगातार बना रहे।
समझ रहे हो? दूरी और कुछ नहीं होती, कभी कोई दूरी नहीं हो जाती है| अब इस बात को जो कह रहा हूँ पकड़ लो:
‘विस्मृति ही दूरी है’।
कोई वास्तविक दूरी नहीं है। हमने तीन चार दिन तक दूरी की खूब बात की। अच्छा ही है कि नानक ने आखिरी दिन हमें याद दिलाया कि दूरी है कहाँ।विस्मृति के अलावा और कोई दूरी नहीं है।
श्रोता १: विस्मृति मतलब?
श्रोता २:


