आचार्य प्रशांतः मीनाक्षी का सवाल है, "आचार्य जी प्रणाम! त्योहार दिखावे से लगते हैं। परिवारों में इन त्योहारों पर बहुत पैसा और समय नष्ट होते देखा है। पुराने रीति-रिवाजों का साथ देना और उन पर चलना क्या सही है, गुरु जी?"
नहीं मीनाक्षी, बिलकुल भी आवश्यक नहीं है कि जो रूढ़ि-परिपाटी से होता आया है तुम उसका अनुगमन करती ही रहो। जिस तरीके से दुनिया त्योहार मनाती हैं, जिस तरीके से उन पर समय, सामग्री, संसाधन, पैसा, खर्च करती है, आवश्यक नहीं है कि तुम उसमें सहभागी बनो।
लेकिन ये भी समझना है कि त्योहारों का वास्तविक अर्थ क्या है। हम थोड़े विचित्र लोग होते हैं। जीव का संविधान ही विचित्र है। मन सिर्फ़ आनन्द नहीं चाहता, मन सिर्फ़ शुभता नहीं चाहता, मन इस बात की उद्घोषणा भी चाहता है कि आनन्द है, और शुभता है। और अगर मन को कोई बताने वाला न मिले कि सब भला, सब शुभ, सब अच्छा है तो मन को ऐसा लगने लग जाता है कि कहीं कोई कमी है, कोई खोट है।
इसलिए ज़रूरी इतना ही भर नहीं होता कि सब अच्छा-ही-अच्छा हो, ज़रूरी ये भी होता है कि जो अच्छा है, उसे घोषित किया जाए। जो अच्छा है, उसे सार्वजनिक रुप से प्रकट किया जाए। इसलिए त्योहार आवश्यक है।
इसीलिए आवश्यक हो जाता है कि प्रार्थना में भी परमात्मा के प्रति, गुरुओं के प्रति अहो भाव व्यक्त किया जाए। पाना ही काफ़ी नहीं होता, स्वीकार भी करना पड़ता है कि, "मैंने पाया है!" नहीं तो बहुत संभावना होती है कि तुम स्वीकार नहीं करोगे कि तुमने पाया है, इसीलिए तुमने जो पाया वो मिलकर भी तुम्हें उपलब्ध ना रहे। गौर से देखो तो मिला तो सब ही को हुआ है न? जो कीमती है, जो केंद्रीय है, मिला तो सब ही को हुआ है। लेकिन फिर भी लोग लुटे-पिटे और वंचित से क्यों घूमते हैं? क्योंकि पाना ही काफ़ी नहीं होता, मानना भी तो पड़ता है कि, "मैंने पाया है!" मन को वास्तव में पाने से कम प्रयोजन है और ये मानने से ज़्यादा प्रयोजन है कि, "मुझे मिला।" त्योहार इसलिए है ताकि तुम ज़ोर-ज़ोर से ढोल बजाकर गा सको कि, "मुझे मिला!"


