सच मिट्ठा आशिक प्यारे नू || आचार्य प्रशांत, संत बुल्लेशाह पर (2014)

चुप्प कर के करीं गुज़ारे नूं
सच्च सुणदे लोक ना सहिंदे नी, सच्च आखिए तां गल पैंदे नी, फिर सच्चे पास ना बहिंदे नी, सच्च मिट्ठा आशक प्यारे नूं । चुप्प करके करीं गुज़ारे नूं ।
सच्च शर्हा करे बरबादी ए सच्च आशक दे घर शादी ए, सच्च करदा नवीं आबादी ए जेही शर्हा तरीकत हारे नूं । चुप्प करके करीं गुज़ारे नूं ।
चुप्प आशक तों ना हुन्दी ए, जिस आई सच्च सुगंधी ए, जिस माला सुहाग दी गुन्दी ए छड्ड दुनियां कूड़ पसारे नूं । चुप्प करके करीं गुज़ारे नूं ।
बुल्ल्हा शौह सच्च हुण बोले हैं, सच्च शर्हा तरीकत फोले हैं, गल्ल चौथे पद दी खोल्हे हैं, जेही शर्हा तरीकत हारे नूं । चुप्प करके करीं गुज़ारे नूं ।
~बुल्ले शाह
प्रश्न: तो ये जो चुप्पी की बात हो रही है – एक तो होता है, पाओ और गाओ। और कभी-कभी ऐसा होता है, कि हमने अगर कुछ भी पढ़ लिया, हमें कुछ नयी चीज़ पता चलती है, तो हम अपने सम्बन्धों में बताते हैं कि मुझे ये पता है। तो उसमें कुछ अलग से बात उठ रही है, कि मैं कुछ जानता हूँ। तो क्या उसके लिए ये चुप होना बोला गया है?

