प्रश्न: राजा जनक की पात्रता थी, इसके लिए ज्ञान ग्रहण कर पा रहे थे। पात्रता हो या ना हो, हो या हो जाये, इसके लिए क्या होना चाहिए?
आचार्य प्रशांत: जो सवाल है, उसी में उत्तर है। आपने शब्द बड़ा चुन कर प्रयोग किया है न –- ‘पात्रता’। हिंदुस्तान में शिक्षत्व के लिए बिल्कुल मस्त शब्द चुना गया है –- ‘बर्तन’, ‘पात्र’ माने बर्तन; ये है पात्र। ये पात्र है, इसमें क्या खास है?
श्रोता १: एकदम खाली है।
वक्ता: बस यही है। ये पात्रता, ऐसा होना ही पात्रता है। ये पात्र है। बात वैसे तो संकेत में स्पष्ट ही हो गई होगी लेकिन पात्रता का मतलब और भी है। एक तो ये कि ‘खाली है’, दूसरा ये कि ‘चैतन्य भी है’; ग्रहण करने के लिए कोई मौजूद भी है। कृष्णमूर्ति इसको कहते हैं: ‘कॉन्शियसनेस विदआउट कंटेंट’, चेतना है पर चेतना में भरी हुई सामग्री नहीं है, ये पात्रता हुई। वरना तो पात्र ये भी है, इसमें पात्रता नहीं है लेकिन। ये पात्र देखिये, इसके साथ क्या दिक्कत है? पात्र तो ये भी है।
तो दो बातें हैं: कॉन्शियसनेस चाहिए, ये चेतना हुई; मान लीजिये पर अन्दर का मसाला नहीं चाहिए, ये हुई पात्रता।
गहरी चेतना, बिना बोझ के। जैसे गाड़ी का इन्जन हो ५०० हॉर्स-पॉवर का, पर गाड़ी में वज़न ज़रा भी ना हो, तो अब वो गाड़ी कितनी रफ़्तार से भाग सकती है? तो तगड़ा इन्जन, गहरी चेतना, जो समझ सकती है, लेकिन उस चेतना पर बोझ नहीं है। काहे का बोझ?

