प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मैं आज शिविर में आया हूँ तो क्या यह मेरा निर्णय है या यह एक पूर्व-निर्धारित घटना है?
आचार्य प्रशांत: आप यहाँ पर आए हो ये आपके अहं का निर्णय है। आपको मुक्त होना ही है ये बात आपके निर्णय की नहीं है, यह बात तय है। आपके निर्णय की वही सब चीज़ें हैं जो संसार के घटना चक्र में घट सकती हैं, जो आपके जीवन काल में घट सकती हैं अर्थात काल के भीतर की हैं, समय के भीतर की हैं। जो कुछ समय के भीतर घटता है — आज घटेगा, कल घटेगा, एक साल, दो साल, छह साल बाद घटेगा या छह साल पहले घटा। उस सब में आपका निर्णय चलता है, आपका निर्णय शामिल है। मुक्ति में आपका निर्णय नहीं शामिल है। मुक्ति होनी-ही-होनी है; मुक्ति समय से बाहर की घटना है। हाँ, मुक्ति आपको कैसे मिलेगी, कब मिलेगी, कितनी देर लगा कर मिलेगी — ये आपका चुनाव होता है, आपका अर्थात अहं का।
मुक्ति के लिए आपको आना ही पड़ेगा। ये पत्थर की लकीर है, आना ही पड़ेगा। लेकिन कब आओगे ये आप जानो। आपने ये फैसला कर लिया है कि आप अभी प्रयत्नरत हो गए, आप ये भी फैसला कर सकते थे कि आप अभी पाँच साल और टालते रहते। मुक्त होना है — ये आपका सौभाग्य भी है, ये आपकी बाध्यता भी है, यही आपकी नियति है, यही आपका स्वभाव है, यही आपका स्वरूप है। भीतर आपके कुछ बैठा हुआ है जो मुक्त है ही इसीलिए उसे अमुक्त रखा नहीं जा सकता और बाहर-बाहर अमुक्ति-ही-अमुक्ति है। भीतर कोई बैठा है जो मुक्ति के अलावा कुछ जानता नहीं और बाहर-बाहर अमुक्ति-ही-अमुक्ति है। बाहर-बाहर क्या चलेगा? वो आप जानो, आपका हिसाब जाने। वो आपका चुनाव, आपके निर्णय। आप चाहो तो उसमें पाँच साल लगा लो, पचास साल लगा लो, आप चाहो तो सीधे रास्ते से जाओ, आप चाहो तो पूरी दुनिया घूम कर जाओ, आपको जैसे करना हो करो।
लेकिन मुक्त तो होना पड़ेगा क्योंकि अंदर और बाहर में ये जो विभाजन है ये झूठा है, ये जो संघर्ष है उसका परिणाम तय है — केंद्र जीतेगा परिधि हारेगी, हृदय जीतेगा मन हारेगा। सत्यमेव जयते! आत्मा ही जीतेगी, माया को हारना पड़ेगा। लेकिन माया भी कमज़ोर खिलाड़ी नहीं है, वो कहती है, "हार तो जाऊँगी पर समय बर्बाद करके हारूँगी, ये तो मुझे पता है कि जीतेगी मुक्ति ही लेकिन इतना तो मैं कर सकती हूँ न कि तेरे अस्सी साल खराब कर दूँ। अस्सी साल का जब तू हो जाए तब तुझे ये समझ में आए और तब तू मुक्ति का चुनाव करे। चुनाव तो तुझे अंततः करना पड़ेगा मुक्ति का ही।" पर माया कहती है कि, "मैं जाते-जाते भी नुकसान तो करके ही जाऊँगी, अस्सी साल खराब करके जाऊँगी। एक नहीं अनेक देशों की यात्राएँ करवा कर जाऊँगी।" घूम लो पूरी दुनिया, अपने ह्रदय तक तो पहुँचे नहीं। बुल्लेशाह बाबा बोल गए हैं —



