वक्ता: लीला और कृपा में संबंध क्या है? और जपुजी साहिब में ‘हुक्म’ शब्द का बहुत बार प्रयोग हुआ है| ये शब्द क्या है?
श्रोता १: ‘हुक्म’ शब्द से मुझे ये समझ आया है कि ‘उसकी’ इच्छा; पर अगर मुझे इसे और आगे लेकर जाना है तो कैसे लेकर जाऊं?
वक्ता: लीला, कृपा, हुक्म, तीनों एक हैं| अंतर बस ये है कि देखनेवाला मन कहाँ पर स्थित है| मन कष्ट में था, पीड़ा पा रहा था और पाता है कि पीड़ा से मुक्ति मिल गयी है, बिना किसी कारण, अपने प्रयत्नों के फलस्वरूप नहीं, बस मुक्ति मिल गयी है| और वैसी मुक्ति भी नहीं, जैसी वो चाहता था| अचानक एहसास हो रहा है कि ये तो जो चाहते थे उससे कहीं आगे की बात है| तो वो इसको ‘कृपा’ बोलेगा| कृपा में भाव ऐसा है कि जैसे मनचाहा मिल गया हो, पर वास्तव में अगर मनचाहा कुछ मिला हो तो वो कृपा कहलाई नहीं जा सकती| उसको आप इच्छापूर्ति का नाम दे दीजिये, पर वो कृपा नहीं है| वास्तव में जब कृपा होगी तो बड़ी संभावना इसी की है कि मन उससे सहमत नहीं होगा; मन उसको स्वीकार नहीं करेगा| मन को मन की ही दिशा में आगे ले जाये कृपा, ऐसा बहुत हुआ ही नहीं| कृपा जिन रूपों में आयेगी, वो रूप आपको पसंद आयेंगे ही नहीं| इसलिए कृपा में ये भाव होते हुए भी कि जैसे मनोकामना पूरी हुई हो, कृपा शब्द के प्रयोग में बड़ा सावधान होना चाहिए क्योंकि कामनाओं के पूरा होने का नाम कृपा नहीं है| कृपा, कृपा ही है; इसका एहसास भी बड़े विचित्र तरीके से होगा| ये मत समझिये कि आपने मिठाई माँगी और मिल गयी तो आप कहें कि प्रभु-कृपा हो गयी| ये प्रभु-कृपा नहीं है, ये इच्छापूर्ति है| कृपा तो ऐसी है कि जैसे माँगा कुछ और, मिल कुछ ऐसा गया जिसको माँगने का आपको विचार भी नहीं आ सकता था| कृपा तो ऐसी है कि आप दो रुपये माँगने गये थे और करोड़ों मिल गये| और वो करोड़ों भी किसी ऐसे आयाम में है जो मन के परे है| दो रूपये और करोड़ रुपये भी जब बोलते हैं तो आयाम एक है| क्या आयाम है? रूपया! ऐसा कुछ, जो गिना जा सकता है| तो दो रुपये और करोड़ रुपये की तुलना भी की जा सकती है|
कृपा का अर्थ है कुछ ऐसा मिल गया जो अमूल्य है, जो किसी और आयाम में ही है, जो माँगने के आगे है| कृपा का अर्थ है कि कुछ ऐसा मिला कि माँगने की आवश्यकता ही खत्म हो गयी| भिखारी होने का भाव ही जाता रहा, वो कृपा है| कृपा का आप कोई कारण नहीं पायेंगे| वो अकस्मात् होती है या उसके कारण हैं भी तो हमसे आगे के हैं|

