प्रश्नकर्ताः आचार्य जी, कर्म माने क्या?
आचार्य प्रशान्त: कर्म होता है और कर्म दो जगहों से निकलता है — या तो साफ केंद्र से, हृदय से, या अहंकार से। बस इतना ही। अहंकार से जो कर्म निकलेगा वह हमेशा भविष्यवाची होता है, हमेशा किसी फल, किसी मंतव्य की अपेक्षा में होता है। तो वो फिर भविष्य का निर्माण करता है। तुम आज कुछ ऐसा कर रहे हो जो हो ही कल की ख़ातिर रहा है तो अब तुम्हें कल तक जाना पड़ेगा न उसका फल लेने के लिए। अब कल तक जा क्यों रहे हो, क्योंकि पीछे कर्म का बोझ है उसके ख़ातिर अब कल तक जा रहे हो। यह तुम्हारी पीठ पर लदा कर्मफल कहलाता है, कि जब करा ही कल के लिए था तो अब कल तक चलो।
और एक दूसरा मन होता है जो कल की ख़ातिर नहीं करता। जो बस करता है। वह इसलिए नहीं करता कि किसी उद्देश की पूर्ति हो जाए, वो मात्र करता है। आज सभी गा तो रहे थे — "सारे कर्म हमारे किए, हम कर्मन से न्यारे हो।" यह दूसरा मन है। जो सारे कर्म करता है लेकिन सारे कर्म करते हुए भी कर्मों से न्यारा रहता है, कर्मों से अछूता रहता है। इसे भविष्य की कोई लिप्सा नहीं। इसके लिए कोई कर्म नहीं।
प्र: कोई आदमी किसी पर चिल्ला रहा हो, गुस्सा है, तो इसका स्थूल परिणाम यह है कि इस चिल्लाने का उसको जवाब दे दो चाहे महीने बाद या तीन महीने बाद, और उसका जो सूक्ष्म परिणाम है वह है कि जो स्वयं की मानसिक स्थिति थी, जो शांत थी उसको डिस्टर्ब किया तो उसकी सज़ा उसको तुरंत मिल गई। इसमें जो हम सूक्ष्म चीज़ देखें तो उसमें तो कर्म के फल का कुछ लेना देना है ही नहीं। आप का कर्म था तो उसकी वजह से कुछ हुआ। आपको नहीं पता सही कर्म क्या है इसलिए मानसिक रूप से परेशान हुए।
आचार्य: जहांँ स्थूल होता है वहाँ समय होता है। स्थूल के साथ समय होगा-ही-होगा। अब उदाहरण के लिए, मन पर तात्कालिक प्रभाव पड़ गया। तुम चिल्ला लिए। जिस चीज़ का प्रभाव मन पर पड़ रहा है उसका प्रभाव शरीर पर पड़ेगा ही। शरीर पर दो दिन बाद पड़ेगा, तत्काल नहीं पता चलेगा। जो कुछ भी अपूर्णता के केंद्र से किया जाता है, वह फिर समय में पूर्णता खोजता है। जहांँ तक इस तरह की घटनाओं का सवाल है कि कहीं कुछ चोट लग गई, कुछ हो गया, कुछ दुर्घटना हो गई तो उसके लिए कौन ज़िम्मेदार है, कोई ज़िम्मेदार नहीं है। उसके लिए तुम यह नहीं कह सकते कि यह तुम्हारा कोई कर्म था। यह बड़े अहंकार की बात है कहना कि, "मेरे किसी पुराने कर्म की वजह से मुझे आज चोट लगी है।"



