जो योगी है, जो सुलझा हुआ आदमी है, वो कहता है, ‘ज़रुरत क्या है, ज़रुरत क्या है अपने हिसाब को बीच में लाने की?’ तुम बीच में से हट जाओ और ‘डायरेक्ट एक्शन’ होने दो, सीधे फ़तवा वहीँ से आने दो। इसी बात को ‘स्पोंटेनिटी’ भी कहते हैं। कि तुम अगर उत्तर दोगे, तुम अगर निर्णय करोगे तो तुम्हे सोचना पड़ेगा, और तुम अगर सीधे फतवे पर अमल करोगे तो सोच का सवाल ही नहीं है। उधर से आया आदेश, और तुमने उस आदेश को बस अमल दिया, तामील कर दी उसकी, यही ‘स्पोंटेनिटी’ है। स्पोंटेनिटी का मतलब है, ‘मैंने सोचा नहीं, मैंने नहीं सोचा मुझे क्या करना है, मैं तो हुक्म पर बस चल पड़ा। मुझे सोचना है ही नहीं कि मुझे क्या करना है, मैं तो पूछ लेता हूँ, मैं तो उसके फतवे पर चल लेता हूँ। मुझे अपने दिमाग पर बोझ लादना ही नहीं है कि निर्णय करूँ और कर्ता बनूँ, और सोचूं, विचारूं और विकल्प तलाशूँ। मैं तो निर्विकल्प हूँ, क्यों? क्योंकि मुझे एक आदेश पर चलना है, जिसे एक आदेश पर चलना है वो क्यों दस विकल्प खोलेगा। मुझे जब उन विकल्पों पर चलना ही नहीं तो उन विकल्पों को खोलने का फायेद क्या? मुझे पता है मुझे क्या करना है, मुझे तो पूछ लेना ही, मुझे तो हट जाना है और जो हो उसे होने देना है। अपने आप को बीच में डालने की झंझट रखनी ही नहीं है’।