सोच कर दिया तो व्यर्थ दिया || आचार्य प्रशांत, यीशु मसीह पर (2014)

But when thou doest alms, let not thy left hand know what thy right hand doeth.
Mathew(6:3 )
किन्तु जब तू किसी दीन दुःखी को देता है तो तेरा बायाँ हाथ न जान पाये कि तेरा दाहिना हाथ क्या कर रहा है।
मैथ्यू(6:3)
आचार्य प्रशांत: बाएं हाथ को पता भी न चले। पर क्या करें हम जो कुछ करते हैं वो करते ही इसीलिए हैं कि किसी और को पता चले, विशेषकर जब हम दे रहे होते हैं। क्या करें हम अगर देते कभी हो ही न, बदले में धन्यवाद खरीदते हों। क्या करें हम अगर देने का पूरा उद्देश्य ही यही हो कि दुनिया भर को पता चले? हम ऐसे ही हैं। मौन में हमसे दिया नहीं जाता, दिया और किसी को पता न चला, तो हमारा मन कहता है, देना व्यर्थ गया। किसी को तो पता चलना चाहिए।
गुप्तदान की भी व्यवस्था की गयी है, तो उसमें हम कहते हैं चलो किसी और को नहीं पता चला, हमें तो पता चला ना कि हमने दिया, हम खुश हो लेते हैं। अहंकार को ताकत मिल जाती है। “मैं कौन? मैं दानी।” एक नई पहचान मिल गई। बड़ी गौरवपूर्ण पहचान है, मैं इतना बड़ा हूँ, मैं दे सकता हूँ। तो सबसे निचले तल पर तो वो जो देकर ढिंढोरा पीटते हैं, उनसे ऊपर वो जो देते हैं तो किसी और को नहीं बताते पर खुद मन ही मन उसका रसास्वादन करते हैं, जीसस कह रहे हैं, “तुम तीसरे बनो, इन दोनों से आगे, तुम यूँ दो कि तुम्हें भी न पता चले कि तुमने दिया। बायाँ हाथ दे ओर दायें को खबर ना हो।”


