प्रश्नकर्ता: मन में हमेशा एक ऐसा विचार आता है, मतलब कई बार; पिछले बार कई बार पढ़ा उसके हिसाब से, कि अगर कहते हैं, "होइहै वही जो राम रचि राखा", तो क्या मतलब ये अध्यात्म में ऐसा मानें कि आत्मा-परमात्मा अलग रहे बहुकाल? तो ये ऐसा होता ही है मतलब ये? तो ये होना ही है, साइकल (चक्र) ही है ऐसा? क्या मतलब निकालें उसका?
आचार्य प्रशांत: ऐसा है। यहाँ पर जिस अर्थ में आत्मा और परमात्मा की बात की गई है, आत्मा मन है और परमात्मा सत्य है। वैदिक-भाषा में अगर इसको देखेंगे तो यहाँ जिसको आत्मा कहा गया है वो मन है और जिसको परमात्मा कहा गया है वो आत्मा है। ठीक है? उपनिषदों में आत्मा-परमात्मा दो नहीं होते, एक ही होते हैं; आत्मा ही होती है, आत्मा के अलावा कोई परम-आत्मा नहीं होती। आत्मा ही परम है, तो अब परम-आत्मा क्या होगी? ये वैसी ही बात हो जाएगी जैसे कोई कहे सत्य और परम-सत्य; सत्य जब है ही, तो परम-सत्य क्या होगा? एक ही है।
लेकिन चूँकि आम-आदमी की ये आदत बन जाती है कि वो मन के साथ ही पहचान बना लेता है, वो मन को ही 'मैं' समझने लगता है, तो आम बोलचाल की भाषा में मन का ही नाम पड़ जाता है आत्मा। और फ़िर हम आत्मा को लेकर इस तरह की बातें भी करने लग जाते हैं कि "मेरी आत्मा बेचैन है, आत्मा तड़प रही है”, या “आत्मा की शांति के लिए ऐसा काम करना है”, या “मेरी आत्मा ऐसा कह रही है।“ अब निश्चित रूप से ये सारी बातें औपनिषदिक-आत्मा के बारे में तो नहीं कही जा रहीं, क्योंकि वो तो अकर्ता है और स्वयंभू है और पूर्ण है। आत्मा यदि सत्य है, तो सत्य तड़प कैसे सकता है? कह रहे हैं कि आत्मा की शांति के लिए कुछ करना है, आत्मा यदि सत्य है तो सत्य अशांत कैसे हो गया भाई? कि अब उसे तुम शांत करोगे। तो यहाँ आपने आत्मा-परमात्मा के विषय में जिज्ञासा की है; सर्वप्रथम ये समझना ज़रूरी है कि वो जिज्ञासा मन और आत्मा के बारे में है।
अब कह रहे हैं कि "राम रचि राखा। ये किसने कर दिया कि मन आत्मा से अलग हो गया? राम ने ये खेल रचा ही क्यों? ऐसा हो ही क्यों गया कि मन आत्मा से अलग हो गया?” मन की जो भौतिक अभिव्यक्ति है, उसका नाम है जीव। ठीक है? और जीव के सामने खड़ा है संसार। और आत्मा का ही दूसरा नाम है, हमने जैसा कहा था, सत्य। तो घूम-फिर कर आपका प्रश्न ये है कि “ये संसार है ही क्यों?” क्योंकि जब संसार है तभी तो जीव में और आत्मा में, मन में और सत्य में दूरी है न? दुनिया ही ना होती, जीव ही ना होता, तो कोई द्वैत ही ना होता, कोई दूरी ही ना होती। आप पूछ रहे हैं कि “ये दुनिया है ही क्यों?” क्योंकि आप हैं। कौन कह रहा है कि दुनिया है? आप ही तो कह रहे हैं, क्योंकि आप हैं। हम ही हैं ये कहने वाले कि ये दुनिया है, हमें ही ये प्रश्न उठ रहा है कि “ये दुनिया क्यों है? दुनिया क्या है?” ये जानने के लिए उस तक जाना होता है जो ये पूछ रहा है कि “दुनिया क्यों है?” उससे पूछना होता है कि “तू कौन है? क्योंकि दुनिया को देख तो तू ही रहा है, तेरे अलावा तो कोई है ही नहीं गवाही देने वाला कि कोई है भी! तू ना हो तो कोई ना बोल पाए कि दुनिया है। तो तू बता, तू कौन है? तू कौन है जो दुनिया को अपने-आप से अलग देखता है? तू दुनिया को अपने-आप से अलग देखता है तो निश्चित रूप से दुनिया तेरी ही वजह से है, और तू ना हो तो फ़िर दुनिया भी नहीं होगी।“


