प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, छल-कपट को कैसे पहचानें और इससे कैसे बचें?
आचार्य प्रशांत: छल को पहचानने के लिए बहुत निश्छल आँख चाहिए। एक कपटी व्यक्ति दूसरे कपटी व्यक्ति को पहचान तो सकता है, जान नहीं सकता; दोनों बातों में अंतर समझना।
जानने का मतलब है मुक्त हो जाना, पहचानने का मतलब है पुरानी चीज़ से तालमेल बैठा लेना, पुरानी सूचना से तालमेल बैठा लेना।
मैंने इनको कल देखा था और मैं इनका नाम जानता हूँ, आज ये दोबारा मेरे सामने आएँगे मैं कहूँगा, "अच्छा ये वही तो हैं जिन्हें मैंने कल देखा था, मैं इनका नाम जानता हूँ।" मैं इन्हें पहचान गया पर मैं इनको जान नहीं पाया हूँ, पहचान गया हूँ बस।
सच्ची पहचान है जानना। हम जिसको पहचानना कहते हैं वो तो सिर्फ सूचना का मिलान है, रिकग्निशन (अभिज्ञान) है। पहले से जानते थे, दोबारा मिलान कर लिया। जो निश्छल होता है वो भली-भाँति जान जाता है कि छल क्या है। जो छली है वो नहीं जान पाएगा।
तो आपको अपने प्रश्न को उलटना पड़ेगा। आप कह रहे हैं कि, "दुनिया मैं छल-कपट की पहचान कैसे करें?" यहाँ पर आपका सारा ज़ोर दुनिया पर है, आप बात दूसरे की कर रहे हैं, आप कह रहे हैं, "मुझे कैसे पता चले कि वो दूसरा व्यक्ति कपटी है या नहीं है?" प्रश्न को उलटिए, ये मत कहिए कि दूसरा कपटी है या नहीं, ये पूछिए कि, "क्या मैं निष्कपट हूँ?"


