स्वज्ञान (आत्मज्ञान) वो आग है जो इच्छारूपी सूखी घास को जला देती है। —योगवासिष्ठ सार
आचार्य प्रशांत: इच्छा को सूखी घास क्यों कहा है, समझेंगे। इच्छाओं का एक पूरा अन्तर्सम्बन्धित जाल होता है, *नेटवर्क*। कोई इच्छा अकेली नहीं खड़ी होती, वो अपने पीछे भी दस इच्छाएँ लेकर आई होती है, उसके आगे भी इच्छाएँ होती हैं, उसके अगल-बगल में भी—पूरा एक कुनबा होता है जिसमें सब रिश्तेदार हैं।
सूखी घास कैसे जलती है? तृण का एक तिनका ईंधन बनता है अन्य तिनकों को जलाने के लिए। थोड़ी सी जलती हुई घास बहुत सारी सूखी घास को जला देगी, जैसे वो स्वयं आत्मघाती हो, जैसे वो स्वयं न सिर्फ खुद को नष्ट करने के लिए बल्कि अगल-बगल वालों को, अपने कुनबे-कुटुंबियों को भी नष्ट करने के लिए तैयार ही बैठी हो। घास जलती है तो खुद ही नहीं जलती है, अपने साथ और घास को भी लेकर जलती है—और जो और जलेगी, वो क्या करेगी? वो और को लेकर जलेगी।
तो इच्छा का भी ऐसा ही है। या तो आप उससे हारते हैं तो पूरी तरीके से हारते हैं। आप एक इच्छा के वश में नहीं होते, आप इच्छाओं के वश में होते हैं। आप एक के पीछे एक इच्छा की तरंग-दर-तरंग दबते चले जाते हैं। और यदि आपने एक इच्छा पर भी पूर्ण विजय प्राप्त कर ली—पूर्ण विजय से अर्थ है पूर्ण ज्ञान, ऋषि कह रहे हैं आत्मज्ञान—यदि किसी एक इच्छा को भी किसी एक पल में पूर्णतया देख लिया, उसके मूल तक पहुँच गए, तो आप पाएँगे कि सारी इच्छाओं के भस्म होने का मार्ग प्रशस्त हो गया; क्योंकि मूल सबका एक ही था।
एक इच्छा का मूल देख लिया तो सारी इच्छाओं का मूल देख लिया। मूल सबका एक है और मूल सबका झूठा है। एक इच्छा का झूठ पकड़ में आ गया, एक इच्छा का भ्रम दिख गया तो आपकी विजय पूरी है। बस आपको बने वही रहना है जो विजयी हुआ था। विजय तो विजयी के लिए है, जो विजय हुआ था, वही बने रहो, कदम पीछे मत खींच लेना।


