तुम्हारी प्रकृति है भूल जाना, और स्वभाव भूलकर भी न भूल पाना ||आचार्य प्रशांत, संत दादूदयाल पर (2015)

मन माणिक मूरख राखि रे, जण-जण हाथ न देऊ।दादू पारिख जौहरी, राम साधु दोइ लेऊ।।71।।
~दादू दयाल
वक्ता: मन के बारे में दो मूलभूत बातें कही गई हैं। दोनों दिखने में अलग-अलग हैं, कदाचित ये भी लगे की विपरीत है। लेकिन दोनों एक साथ चलती हैं। इसी विचित्रता, इसी संगम का नाम मन है।
पहली बात, ‘मन माणिक है’। दादू कह रहे हैं; संत के वचन हैं। वो सीधे बात पे आते हैं, सीधे चोट करते हैं। मन माणिक है। मन कीमती है। अमूल्य है। साथ ही साथ, उसी साँस में कहा जा रहा है, “जन-जन हाथ न देऊ।” मन कीमती है। मन माणिक है। मन रत्न है। लेकिन फिर भी कहा जा रहा है कि उसे हर किसी के हाथ मत देना। देखें की क्या कहा जा रहा है|
कहा ये जा रहा है कि मन एक ऐसी वस्तु है जो कीमती तो है पर अपनी कीमत गंवाने को तैयार रहता है। मन एक ऐसी वस्तु है जो निर्मल तो है, पर मलिन होने को तैयार रहता है। इन दोनों बातों एक साथ समझिएगा। ‘मन माणिक, जन-जन हाथ न देऊ।’ मन एक ऐसा मणि है, जिसकी माणिक्यता, जिसका मूल्य अक्षुण्ण नहीं है, प्रत्याभूत नहीं है। स्तिथि ऐसी बन सकती है की वो माणिक बनके चमके और स्तिथि ऐसी भी बन सकती है कि वो बाज़ार की धूल बन जाए। दोनों बातें हैं |और मैंने आपसे कहा कि वो दोनों विपरीत लग सकती हैं।
आम तौर पर जब कोई चीज़ अमूल्य होती है, तो उसके साथ एक विश्वास जुड़ा होता है कि अमूल्य है और मूल्य खड नहीं सकता। मन के साथ, दादू ये विश्वास व्यक्त नहीं कर पा रहे। वो कह रहे हैं, “मन माणिक, लेकिन जन-जन हाथ न देऊ।” कीमती तो है पर कीमत बची रहे, ये ज़रूरी नहीं है। हीरा तो है, पर इस पर गन्दगी की इतनी परतें जम सकती हैं कि मिट्टी का ढेला जैसा हो जाए। और यही मन है। बड़े सुन्दर तरीके से, बड़े सहज तरीके से इतनी गहरी बात कह दी है संत ने कि हो सकता है कि हम समझने से चूक जाएँ
