युजे वां ब्रह्म पूर्व्य नमोभिर्विश्लोक एतु पथ्येव सूयः। शृण्वन्तु विश्वे अमृतस्य पुत्रा आ ये धामानी दिव्यानी तस्थुः॥
हे मन और बुद्धि! तुम्हारे स्वामी और सबके आदिकारण परब्रह्म परमात्मा से मैं नमस्कार के द्वारा संयुक्त होता हूँ। मेरा श्लोक (स्तुतिकर्म) विद्वान् के यश के समान सर्वत्र फैल जाए। दिव्य लोकों में वास करने वाले सभी अमृतरूप परमात्मा के अंशधर पुत्रगण मेरी बात सुनें।
~ श्वेताश्वतर उपनिषद् (अध्याय २,श्लोक ५)
आचार्य प्रशांत: 'हे मन और बुद्धि! जो तुम्हारा स्वामी है, उसे मैं नमन करता हूँ। और नमन के द्वारा मैं उससे संयुक्त होता हूँ। जो तुम पर राज करता है, जिसकी संतति हो तुम, मैं सीधे जाकर उससे युक्त होना चाहता हूँ, तुमसे नहीं। मैं क्यों कहूँ कि मैं मन हूँ, मैं क्यों कहूँ कि मैं बुद्धिमान हूँ, जब ना मन हो करके, ना बुद्धि हो करके मुझे शांति मिलनी है?'
मन, अतृप्ति का ही दूसरा नाम है और बुद्धि में इतनी सामर्थ्य होती नहीं कभी कि वो उस अतृप्ति को हल कर पाए, समाधान दे पाए। तो, 'मन और बुद्धि! मैं सीधे वहाँ जाता हूँ न जहाँ से तुम आए हो। आशय यह है कि तुम अशक्त हो। प्रमाणित होता है मेरे ही जीवन से कि तुम अशक्त हो। तुमसे ज़्यादा शक्तिशाली निश्चित रूप से वह होगा जो तुम्हारा प्रणेता है, जहाँ से तुम उठते हो या जिसकी कामना में तुम लगे रहते हो, मैं सीधे उसके पास जाऊँगा। उसके सामने मैं नमन करता हूँ, मैं उससे संयुक्त होता हूँ।'
सूत्र है यहाँ पर, कि संयुक्त ना हो पाने का कारण ही है नमस्कार ना करना, माने नमित ना होना। जो मिल नहीं पा रहा वो इसीलिए नहीं मिल पा रहा है क्योंकि वो झुक नहीं पा रहा है। झुकना इसलिए ज़रूरी है क्योंकि तुम्हारा झुकना ही तुम्हारी सच्चाई है। तुम छोटे हो, तुम सीमित हो, झुक कर के तुम बस इस सच्चाई को मान लेते हो। तुमने यह नहीं करा है कि ग़ैरज़रूरी, अनावश्यक विनम्रता दिखा दी है। तुमने तो बस जो सच्चाई थी, वो मान ली है। और सच्चाई यह है कि कुछ है जिसके सामने तुम्हारा कद बहुत छोटा है। नमस्कार करके तुमने बस सत्य को हामी भर दी है। तुमने सत्य को हामी भरी नहीं कि तुम सत्य के साथ हो लिए। यही तो होता है युक्त होना।

