वक्ता: दिखता दोनों को है, ज्ञानी को भी और अज्ञानी को भी, आँखें दोनों की ही काम करती हैं| ज्ञानी, अज्ञानी आँखें दोनों की ही काम करती हैं| पर एक यदि पत्ती को देखेगा तो उसके लिए पत्ती क्या है? ‘पत्ती’, एक शब्द, एक परिभाषा, एक संकल्पना, और दूसरा जब पत्ती को देखेगा, तो उसका पत्ती को देखना एक दूसरी ही घटना है, अव्याख्य घटना| वो पत्ती के साथ एक है, वो पत्ती में और अपने में अंतर नहीं पा रहा है| जिसको कृष्णमूर्ति कहते हैं, “दृष्टा दृश्य है”| उसके लिए पत्ती अब एक परिभाषा नहीं है| उसके लिए पत्ती क्या है? जैसा उन्होंने लिखा है, ‘आश्रय भूत एक नित्य सत्य है’| यही लिखा है न ? क्या लिखा है ?
श्रोता १: एक सत्य, पूर्ण अरूप तत्व में प्रकाशित होता है |
वक्ता: उसको दिखाई पड़ेगा कि इसमें और मुझमें, और पत्थर में और हवा में एक तत्व है| ये भेद होता है ज्ञानी और अज्ञानी की दृष्टि में| अज्ञानी की दृष्टि में पत्ती और हवा दो अलग-अलग तत्व हैं, और वो उनमें क्या रखेगा? भेद रखेगा| ज्ञानी पत्ती को देखेगा तो ये नहीं है कि पत्ती नहीं दिखाई पड़ेगी| तुम उससे कहोगे, “पत्ती उठा कर लाओ”, तो पत्ती ही उठा के देगा, पत्थर नहीं उठा कर दे देगा| पर गहराई से उसको ये पता है कि पत्ती हो, और चाहे पत्थर हो, और चाहे उन दोनों को जानने वाली चेतना हो, ये क्या हैं? ये एक हैं| यही दोनों की दृष्टि में अंतर है और इसी को समभाव भी कहते हैं|
श्रोता २: एक दृष्टि|
वक्ता: एक दृष्टि, ये एक दृष्टि है|
श्रोता ३: पर इन सबके तो आकार हैं|


