साधना के बाह्य प्रतीकों का आंतरिक अर्थ || गुरु नानक पर (2014)

मुंदा संतोखु सरमु पतु झोली धिआन की करहि बिभूति ॥ ~ पौढ़ी (जपुजी साहिब)
अनुवाद: संतोष को वैसे ही मन के समीप धारण करो जैसे कुंडल, विनय को ऐसे साथ लेकर के चलो जैसे तुम्हारा भिक्षा पात्र, और ध्यान को देह पर लगाने वाली भस्म।
आचार्य प्रशांत: संत का हमेशा यही काम होता है कि आप जिन बातों को भौतिक समझने लग जाएँ, वो उनके आत्यंतिक अर्थ निकाल कर रख दे आपके सामने। आप जीव को भौतिक समझें और वो जीव का असली अर्थ आपके सामने रख दे, आप पूजा को और प्रसाद को और अक्षत को भौतिक समझें और वो उनका वास्तविक अर्थ आपके सामने रख दे। आप प्रेम को भौतिक समझें और वो प्रेम का पारमार्थिक अर्थ आपके सामने रख दे। वही ये कर रहे हैं, वो कह रहे हैं, “संतोष को वैसे ही मन के समीप धारण करो जैसे कुंडल धारण किए जाते हैं”, सदा धारण किए रहते हो और कुंडल सारी इन्द्रियों के और मन के समीप रहते हैं, तो संतोष को ऐसे ही धारण करो।
प्रश्नकर्ता: स्पर्श भी कर रहे होते हैं।
आचार्य: बढ़िया, वैसे भी कह लीजिए।
विनय को ऐसे साथ लेकर के चलो जैसे तुम्हारा कटोरा—भिक्षा पात्र।
प्र: जैसे कमंडल।

