आचार्य प्रशांत: ये भी संवाद का एक बड़ा आम सवाल रहता है कि प्रारब्ध ज़्यादा महत्वपूर्ण है या पुरुषार्थ। ‘पुरुषार्थ’ मतलब, ‘मैं करके दिखाऊँगा’ और प्रारब्ध मतलब, ‘मैं क्या करूँ? सब पहले से ही तय है।’ दोनों ही अहंकार के लिए ही हैं।
प्रारब्ध भी अहंकार का है और पुरुषार्थ भी अहंकार का है। प्रारब्ध कहता है, "करना चाहते हैं, कर नहीं सकते।" पुरुषार्थ कहता है, "करना चाहते हैं, करके दिखाएँगे।" जो प्रारब्धवादी है वो कहता है, "करना तो चाहते हैं पर क्या करें किस्मत ही ऐसी है।" पुरुषार्थ-वादी क्या कहता है?
श्रोतागण: “करना चाहते हैं, करके दिखाएँगे”।
आचार्य: और दोनों ही बातें क्या हैं?
श्रोतागण: अहंकार की।
आचार्य: लेकिन अब सवाल तुम पूछते हो संवाद में तो यह ही पूछते हो कि, "सर, प्रारब्ध ज़्यादा महत्वपूर्ण है या पुरुषार्थ?" तुम को पता भी नहीं है कि तुम प्रारब्ध और पुरुषार्थ के बारे में पूछ रहे हो पर पूछ तुम वही रहे हो। अब क्या जवाब दें?
और जब जवाब दिया जाता है कि दोनों ही अनुपयोगी हैं क्योंकि दोनों में ही कर्ता-भाव है, तो फिर तुम कहते हो कि, "आपने हमारे सवाल का सीधा जवाब नहीं दिया। मैंने तो पूछा था कि दोनों में से चुन कर बता दो; पुरुषार्थ या प्रारब्ध? और आपने कहा कि दोनों ही गड़बड़ हैं। ऐसा कैसे हो सकता है?"


