प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, अध्यात्म में भाग्य या किस्मत मान्य है?
आचार्य प्रशांत: मान्य क्या वो तो होता ही है। उसमें मान्य की क्या बात है? अध्यात्म तथ्य को पूरा सम्मान देता है और सत्य के सामने समर्पित रहता है; तथ्य को सम्मान और सत्य को समर्पण।
तो प्रारब्ध तो होता ही है। तुम जाओगे ऋषियों के पास वो साफ़ बताएँगे कि सब कुछ उपस्थित है तुम्हारे जीवन में — आगामी, संचित, प्रारब्ध। सारे कर्मफल तुम्हें झेलने पड़ेंगे; सब हैं।
ये तथ्यों की बात है। तुम किस घर में पैदा हुए हो अब इस बात से इनकार थोड़े ही कर सकते हो। तो तथ्य है ही। इसी को तो तुम किस्मत बोलते हो न; कोई अमीर पैदा हुआ, कोई गरीब पैदा हुआ, कोई लड़का कोई लड़की, कोई यहाँ कोई वहाँ, कोई ऐसा कोई वैसा। ये तो होते ही है लेकिन सत्य इन सब तथ्यों से ऊपर होता है। तो एक तरफ़ तो इस बात को पूरी मान्यता दी जाती है कि प्रारब्ध होता है और दूसरी तरफ़ साफ़-साफ़ ये भी समझा जाता है कि प्रारब्ध कुछ भी हो कैसा भी हो उसका उल्लंघन किया जा सकता है। सत्य तक पहुँचा जा सकता है। क़िस्मत बड़ी बात है लेकिन किस्मत से भी बड़ी चीज़ कुछ और है।
प्र: आचार्य जी, मनुष्य में जन्म से पशुता रहती है वो अभी समझ में आ गया है। जो नियम है उसमें प्रतिदिन क्या चल रहा है, क्या नहीं, आसानी से दिख रहा है। उससे हम बाहर कैसे आ सकते हैं? हम मानव कैसे बन सकते हैं?
आचार्य: यही शुरुआत है। कोई पशु कभी नहीं पूछता कि वो पशुता से बाहर कैसे आ जाए। कभी देखा है बिल्ली को पूछते कि, “मैं अपने बिल्लीत्व का अतिक्रमण कैसे करूँ?”


