प्रेमियों का प्रेम अक्सर हिंसामात्र || आचार्य प्रशांत, युवाओं के संग (2015)

प्रश्न: हमारा स्वभाव इतना हिंसक क्यों है? हम कुछ भी देखते हैं तो ज़्यादा सोचते नहीं, सीधे उग्र हो जाते हैं। जैसे रास्ते में पत्थर पड़ा है तो उसे लात मारनी है, यह बड़ी आम बात है। ऐसा क्यों?
वक्ता: पत्थर को लात मारने की सम्भावना कब ज़्यादा है?
श्रोता: जब हम गुस्सा हों।
वक्ता: जब गुस्सा हों तो सम्भावना बढ़ जाती है कि एक पत्थर ही पड़ा हुआ है तो उसे लात मार दोगे। तो क्या पता चलता है इससे कि हिंसा का क्रोध से सम्बन्ध है। पत्थर को लात इसीलिए मारी क्योंकि क्रोधित थे। क्रोधित क्यों थे? तो कोई दूसरा था जिससे कोई उम्मीद थी ,वो उम्मीद पूरी नहीं हुई तो क्रोध आया। या अपने आप से भी कोई उम्मीद थी तो वो दूसरों के सन्दर्भ में थी।
तो कुछ दूसरा है जिससे सम्बंधित कुछ हासिल करना है। तो प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से दूसरों से कुछ चाहिए था। नहीं मिला तो, गुस्सा। फिर वही गुस्सा प्रकट्य या अप्रकट्य हिंसा के रूप में उबलता है, विस्फोट होता है। होता है न? जितना ज़्यादा ये भाव होगा कि किसी से कुछ चाहिए, या अपने आप से ही, उतना ज़्यादा उस सम्बन्ध
