प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, आपने जैसे कहा था कि “जब कोई पैदा होता है, तो वो वृत्तियों और विकारों के साथ पैदा होता है।” तो छोटे बच्चे इतने खुश क्यों मालूम पड़ते हैं?
आचार्य प्रशांत: जिनके पास बच्चे हों, उनसे पूछो ज़रा!
ये सवाल कोई छड़ा (कुँवारा) ही पूछ सकता है, कि “बच्चे खुश क्यों मालूम होते हैं?” बेचैनी अगर देखनी हो वास्तव में, तो किसी बच्चे में देखना। तुम उसे शांत बैठा कर दिखा दो! विचलन और ऊब अगर देखनी हो तो बच्चे में देखना। क्षण-भर को उसकी आँखें रुकती नहीं। हाथ चल ही रहा है, पाँव चल ही रहे हैं। मुँह भी चल रहा है – कुछ खाने को नहीं मिला, पीने को नहीं मिला तो अपना ही अँगूठा, कई बार तो पाँव का अँगूठा। तुम्हें बच्चे में शांति कहाँ दिख गई भाई?
वो पैदा होते ही क्या कहता है, कि ‘कमल-मुद्रा’, या चिंघाड़ मार कर रोता है? रोता ही है न? बच्चा तो अगर शांत हो जाए तो माँ-बाप घबरा जाएँगे, “कुछ हो तो नहीं गया इसको?” वो तो पालने में भी पड़ा होता है तो क्या कर रहा होता है? हाथ-पाँव चला ही रहा है। छटपटाहट देखनी हो अगर – पूरे तरीके से जैविक, प्रकृति-जन्य, उसके शरीर में छटपटाहट भरी हुई है – तो बच्चे में देखो। माँ का सारा उपक्रम ही यही होता है कि बच्चे को किसी तरीके से शांत रखूँ, और शांत वो होता नहीं। उसको शांत करने का एक ही तरीका होता है – सुला दो। वो जगा नहीं कि पूरे मोहल्ले को ख़बर हो जाती है, “जग गया इनका।”
अध्यात्म है ही इसीलिए कि जैसे तुम पैदा हुए थे वैसे ही न जियो – छटपटाते, तड़पते। अभी बच्चे को यहाँ ले आओ, कभी इसको पकड़ेगा, इसको पकड़ेगा। हर इंद्रियगत पदार्थ के प्रति उसका आकर्षण है। यहाँ कुछ लाल-सुनहरा कर दो, बच्चा तुरंत क्या करता है? उसकी ओर हाथ बढ़ा देता है। जो उसको दिखा नहीं, जो उसने छुआ नहीं, तुरंत उसकी ओर वो आकर्षित हुआ। कौन-सा बच्चा तुमने देखा है जो निरपेक्ष, निस्पृह-भाव से साक्षी-मात्र हो कर देखता हो? “ठीक! ये जगत का मेला है, सब आवत-जावत है। ये माँ है, ये बाप है।”

