अपने प्रयत्न के सिवा और कोई तुम्हें सिद्धि देने वाला नहीं है।
—योगवासिष्ठ सार
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, प्रयत्न करने का क्या अर्थ है?
आचार्य प्रशांत: प्रयत्न से यही तात्पर्य है जिसकी हम बात कर चुके हैं – उचित कर्म। कोई कितना भी सिखा ले, अंततः जीना तो तुम्हे स्वयं ही है न? जीवन की तो तुम्हारी अपनी ही धारा होगी जो तुम्हारे ही ह्रदय से उठेगी और बहेगी। उस भाषा को पढ़ते वक़्त आप लगातार याद रखिए कि कौन बोल रहा है और किससे बोल रहा है, फ़िर उसमें दुविधा नहीं आएगी।
प्र२: किसी ज्ञानी ने ही कहा है कि सब कुछ मात्र हो रहा है, प्रवाहमान है। लेकिन वशिष्ठ कह रहे हैं कि जो उद्योग छोड़कर भाग्य पर भरोसा करते हैं, वे अपने ही दुश्मन हैं। इसमें विरोधाभास शायद नहीं है लेकिन मुझे क्यों नज़र आ रहा है?
आचार्य: जो होना है, वो तो हो रहा है। प्रश्न यह है कि क्या हम उस होने से सहमति में हैं? कोई स्वास्थ्य का विवरण दे सकता है आपको, कोई बता सकता है आपको कि बीमारियाँ सारी झूठी हैं, लेकिन उससे क्या आपने बीमारी की जो धारणा बना रखी है, वो हल हो जाएगी, शांत हो जाएगी?
सत्य का निष्पादन भर कर देने से असत्य में हमारी धारणा, हमारा विश्वास मिट तो नहीं जाता न? हाँ, नदी बह रही है, लेकिन नदी के भीतर जैसे छोटे-छोटे कंकड़-पत्थर हों, नन्ही धाराएँ हों जिनको यह यकीन हो कि उनका नदी के कुल विराट प्रवाह से बहुत लेना-देना नहीं है, उनकी तो अपनी ही किस्मत है, उनका तो अपना खंडित भाग्य है, वे अपने ही भरोसे हैं। तो उनकी धारणा तो उनके साथ है न?


