नयी दुनिया और पुराने तरीक़े || आचार्य प्रशांत, युवाओं के संग (2012)

आचार्य प्रशांत: मैं आशा करता हूँ कि हम सभी को उत्कृष्टता की चाह है। यह मेरी कल्पना है, आशा है कि मैं गलत नहीं हूँ। क्या मैं गलत हूँ? हम में से कितने हैं, जो उत्कृष्टता नहीं चाहते?
देखिये, होता क्या है कि जिस तरीके से हम बड़े होते हैं, जैसी हमारी शिक्षा प्रणाली है, जैसा हमारा वातावरण है, हमें ये विश्वास दिला दिया जाता है कि हम जिस भी तरीके को इस्तेमाल करें, परिणाम बढ़िया ही होगा। और हमारे आस पास काफ़ी उदाहरण हैं, जो इसी बात की तरफ इशारा करते हैं। जब इतने उदाहरण हैं जो इसी की तरफ इशारा करते हैं, हमें ये भुलावा हो सकता है कि कुछ भी कर के अच्छे परिणाम पाए जा सकते हैं।
आपने क्या देखा है अब तक? आप में से बहुत होंगे जो उत्तर-प्रदेश बोर्ड से होंगे? और आप लोगों ने उत्तर-प्रदेश शिक्षा व्यवस्था में, पिछले पंद्रह सालों में सबसे खराब समय देखा है। जहाँ सिलसिलेवार बदलती सरकारों ने नक़ल करना वैध माना। और मेरा ख़्याल है कि आप में से कुछ लोगों ने कुछ परीक्षा-केंद्रों में ऐसा देखा होगा, जहाँ सरकारों ने नक़ल करने को पूर्णतया वैधानिक करार कर दिया था? देखा है आपने? धड़ल्ले से नक़ल चल रही होती है। ताकि ज़्यादा से ज़्यादा छात्र उत्तीर्ण हो सकें, पास-परसेंटेज बढ़ सकें। और आप सब को पता है कि मैं किस तरफ इशारा कर रहा हूँ! मैं उन शिक्षा-मंत्रियों के नाम नहीं ले रहा हूँ, पर हम सभी जानते हैं कि हम क्या बात कर रहे हैं? हमने वो सब देखा है! और हम सब तब बच्चे थे। ये दसवीं और बाहरवीं के बोर्ड परीक्षा में होता था ज़्यादा। हम सभी तब बच्चे थे! और हमें क्या सन्देश मिला? फ़र्क क्या पड़ता है? जिसने कुछ भी नहीं पढ़ा, पहली डिवीज़न तो उसकी भी आ गयी। सही?
फिर हम आते हैं, दाखिले के चरण में! और हम क्या देखते हैं? हम देखते हैं कि एक लाख से भी ज़्यादा प्रत्याशियों में से, जो उत्तर-प्रदेश टेक्नोलॉजिकल यूनिवर्सिटी से पढ़े हैं, केवल कुछ ही हैं, जो काउंसलिंग के ज़रिये दाखिल किये जाते हैं। और यू.पी.टी.यू. के सारे कॉलेजों की सीट्स कैसे भरी जाती हैं? हमने क्या देखा? हमारा क्या अनुभव रहा?


