प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, किसी भी काम को करने में मन क्यों नहीं लगता है?
आचार्य प्रशांत: अभी कल ही एक लड़का आया था मुझसे मिलने। वो मध्य प्रदेश के सागर जिले में खाद्य विभाग में काम करता है। नया लड़का है, अभी-अभी नौकरी का एंट्रेंस क्लियर किया है और डेढ़-दो साल से वो नौकरी कर रहा है। प्रतिभाशाली लड़का था तो अपना बताने लगा कि ज़िन्दगी खाली-खाली सी लगती है, सूनी लगती है।
ज़्यादातर बातें जो उसने मुझे बताईं जिन बातों से वो नाखुश था, वो उसके काम से सम्बंधित थी। उसने कहा कि वर्कप्लेस इश्यूज़ (दफ्तर से सम्बंधित समस्याएँ) हैं। सरकारी नौकरी है, इस तरह का माहौल है, इस तरह का अनुशासन रखना होता है और कई बार इस तरह की नकारात्मकता देखने को मिलती है।
तो कई बातें उसने बोलीं जो तकरीबन सभी जगहों पर पाई जाती हैं। ऐसा नहीं कि उसी के दफ्तर में माहौल कुछ ख़ास ख़राब था, दुनियाभर के जगहों पर यही हालत है, चाहे पब्लिक सेक्टर, प्राइवेट सेक्टर, सरकारी या कोई भी और जगह। यहाँ तक कि फौज में भी यही हालत है। फौजियों से मिलता हूँ, वो भी अपनी कहानी ऐसे ही बताते हैं।
मैंने उससे जो कहा वो बात सबके लिए उपयोगी है। मैंने उससे कहा कि तुम मुझसे बात कर रहे हो कि दस से छः के बीच में तुम्हें क्या अनुभव होते हैं। तुम अभी उसकी बात छोड़ो। तुम्हारे लिए समाधान का पहला चरण ये है कि तुम मुझे बताओ कि तुम दस से पहले क्या करते हो और छः के बाद क्या करते हो। अभी ये बात छोड़ो कि दफ्तर में क्या माहौल है क्योंकि वहाँ बड़ी व्यवस्था है, एक बहुत बड़ा तंत्र है। तुम तुरंत और अकेले उसको बदल नहीं पाओगे, और उसको बदलने की बात करते रहोगे तो तुम में गुस्सा और क्षोभ भर जाएगा।



