हे राम! माया ऐसी है कि अपने नाश से एक अनूठा आनंद उत्पन्न करती है। इसका स्वरुप जाना नहीं जा सकता है और यह ध्यान से देखने मात्र से नष्ट हो जाती है। —योगवासिष्ठ सार
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, इसका भावार्थ बताएँ।
आचार्य प्रशांत: दो-तीन बातें कही हैं। पहला, अपने नाश से एक अनूठा आनंद उत्पन्न करती है; दूसरा, इसे जाना नहीं जा सकता है। और तीसरी बात, ध्यान से देखने से मिट जाती है। क्या है ये? आप खुश हो जाते हो कि मिटी तृष्णा, मिटी वासना—जो लक्ष्य किया था, वो मिल गया; दुश्मन पर फ़तह हुई, शत्रु का नाश हुआ। और आपको ये नहीं पता होता कि जो मिला है, वो अपने मिलने के कारण ही और भूख पैदा करेगा।
पानी पीते हो तो प्यास बुझती है। शराब पीते हो तो प्यास लगती है। समझना, एक पेय पदार्थ वो होता है जिसको पियो तो तृष्णा बुझेगी और दूसरा पेय पदार्थ वो होता है जिसको आत्मगत करोगे तो तृष्णा और बढ़ेगी, और आग लगेगी। पर उस पल क्या लगेगा जिस पल तुम उसका सेवन कर रहे हो? उस पल तो बड़ा अच्छा लगेगा। तो तुम्हें तो यही लगेगा कि प्यास का नाश हुआ, तुम्हें तो यही लगेगा कि तुम्हें इच्छित वस्तु मिली। अब मिली है या तुम उससे और दूर हो गए?
तुम चाहते क्या थे? तुम चाहते थे तृष्णा का नाश। तुम चाहते थे प्यास से मुक्ति, और तुमने पी क्या लिया? तुमने कुछ ऐसा पी लिया जो प्यास को और बढ़ाएगा। तो तुम खुश तो बहुत हो रहे हो, पर थोड़ी देर में तुम्हें पता चलेगा कि बात क्या है।
माया का अर्थ है वो इच्छाएँ जो तुम्हें यह भ्रम देती हैं कि वो कभी भी पूरी हो सकती हैं। तो तुम इस भ्रम में हो कि पूरी हो जाएँगी तो आनंद मिल जाएगा, तृप्ति मिल जाएगी। तुम यह नहीं समझ पाते कि वो यदि पूरी हुईं तो उसके पीछे चार और खड़ी हैं। कर लो पूरी!


