प्रश्नकर्ता: मेरा सवाल यह है कि गंगा तो नदी हैं, शांतनु ने उससे शादी कैसे कर ली?
आचार्य प्रशांत: ये असली सवाल है। बेटा, उस समय पर ऐसा चलता था। ऐसा ये नहीं चलता था कि लोग नदियों से शादी करते थे, चलता ये था कि जो वानरों की पूजा करते थे—प्रकृति की पूजा का रिवाज़ था—जो वानरों की पूजा करते थे, वो अपने-आपको नाम ही दे लेते थे कि, "हम हैं वानर।" तो हनुमान कोई वानर नहीं थे, हनुमान भी पुरुष ही थे। वो वानरों की पूजा करने वाले समुदाय से थे, वो वानरों की पूजा करने वाले कबीले से थे, तो वो अपने-आपको वानर बोलते थे।
इसी तरीके से अन्य जीवों की या कि पहाड़ों की जो पूजा करते थे, वो अपने-आपको नाग इत्यादि भी बोलते थे। गंगा के तट पर जो जातियाँ रहती थीं, वो अपने-आपको गंगा ही कहना शुरू कर देती थीं। तो गंगा एक स्त्री थी, गंगा नदी से शांतनु ने नहीं शादी करी थी। गंगा एक स्त्री थी जो गंगा तट पर रहती थी।
प्र२: महाभारत की कथाएँ तो ऐसा लगती हैं कि बिलकुल सरल बाते हैं, इन पर सवाल पूछने की कोई ज़रूरत ही नहीं, ये तो सब पता ही हैं। लेकिन भीतर से मुझे ये भी पता है कि मुझे कुछ नहीं पता, और कई बार तो, आचार्य जी, आपने ही अनुभव करवा दिया कि गीतों, कथाओं, दोहों इत्यादि की जो व्याख्याएँ मैं पहले सच मान बैठा था, उसकी असली व्याख्या जो आपने दी, कितने भिन्न तल की थी। लेकिन अहंकार फिर भी इतना प्रबल है कि सवाल पूछना ही मुश्किल है।
ऐसा भी नहीं कि सवाल मैं पूछना नहीं चाहता, लेकिन भीतर एक झूठी निश्चितता का भाव है कि मुझे ये भी पता है, वो भी पता है। ये निश्चितता मुझे सवाल पूछने नहीं देती। आपसे विनती है कि मैं कैसे और क्या होकर महाभारत की कथाओं का पाठ करूँ ताकि मैं भी अर्जुन की तरह अपने ज्वलंत प्रश्न पर पहुँच सकूँ?

