आचार्य प्रशांत: हम सब ये चाहते हैं कि निर्दोष रहें। तो ऐसे में वो स्थिति हम सबको सुहाती है जिसमें हमें ये एहसास हो कि हम में कोई खोट नहीं, हम में कोई दोष नहीं, क्योंकि निर्दोषिता स्वभाव है न। ऐसा माहौल जो तुम्हें ये एहसास करा दे, थोड़ी ही देर को सही, भ्रम रूप में ही सही, कि तुम पूरे हो, तुम बढ़िया हो, तुम पूर्ण हो, परफेक्ट हो, तुम में कोई दोष नहीं, वो तुम्हें हमेशा अच्छा लगेगा।
लेकिन उसमें एक धोखा हो सकता है, धोखा क्या है? पूर्ण हो और अपनी पूर्णता में खेल रहे हो, नहा रहे हो, मस्त हो, वो एक बात है; और अपूर्ण हो, और पूर्णता का भ्रम पाले हुए हो, दूसरी बात है। अगर अपूर्ण हो, तब तो अच्छा यही है कि तुम्हारे सामने ये उद्घाटित कर दिया जाए कि अपूर्णता है। लेकिन जो कोई भी तुम्हें ये बताए कि तुम में अभी कोई अपूर्णता है, उसका दायित्व ये भी है कि तुम्हें ये भी बताए कि अपूर्णता झूठी है, तुम्हारा स्वभाव तो परफेक्शन (पूर्णता) ही है, सवभाव तो पूर्णता ही है। दोनों काम करने पड़ेंगे।
वो भी गलत है जो तुमसे कह दे कि “नहीं, नहीं, तुम में कोई दोष नहीं है”, और वो भी गलत है जो तुमसे कह दे कि, ”तुम में सिर्फ दोष ही दोष है।”
कबीर ने इसी बात को बड़े सीधे तरीके से कह दिया है; गुरु कुम्हार, शिष्य कुम्भ है। घड़ी-घड़ी काढ़े खोंट, अंदर हाथ सहार दे और बाहर मारे चोट।
दोनों काम एक साथ करने हैं, कौन से दो काम? “अंदर हाथ सहार दे, बाहर मारे चोट।” जो कोई तुम्हें चोट ही ना मारे, वो भी तुम्हारे लिए भला नहीं, क्योंकि अगर चोट ही नहीं मार रहा तो तुम्हें लगेगा कि, "हम जैसे हैं बढ़िया हैं", फिर किसी तरीके का कोई बदलाव, कोई सुधार कभी होगा नहीं। और वो भी गड़बड़ है जो तुम्हें चोट तो मारे और अंदर से सहारा ना दे। तुम्हें तो कोई ऐसा चाहिए, जिसे चोट भी मारना आता हो और चोट मारने के बाद सहारा देने के लिए भी मौजूद रहे।

