वक्ता: जो तुधु भावै साई भली कार ||
जो तुझे भाता है, वही भला है| जो तुझे भाता है, सो ही भला है|
क्या भाता है उसे? क्या भाता है उसे?
अचल, अपरिवर्तनीय उसका स्वभाव है| कुछ ऐसा नहीं जो उसे उसके आसान से डिगा सकता हो, भला, चाहे बुरा |
क्या भाता है उसे? क्या कुछ ऐसा भी है जो उसे न भाता हो?
केंद्र पर वो पूर्णतया अडिग है| कोई गति नहीं है उसकी, अचल, अटल| उसके केंद्र पर भाने न भाने का प्रश्न ही नहीं पैदा होता| तो नानक कह रहें हैं, ‘वही मनुष्य भला है, जो वैसा ही हो’| उसका केंद्र सदा अनछुआ रहे| वो कैसा है? पूर्ण कैसा है? उससे एक होकर, उसको जान कर, जीव को नसीहत मिलती है जीवन के बारे में| तो कैसा है पूर्ण? मूलतः, मात्र साक्षी| वैसा ही हो सके यदि जीव, तो इसी में उसकी भलाई है|
कैसा है पूर्ण-परम, व्यक्त जगत में? खिलाड़ी, लीलाकार| ऐसा ही नहीं है क्या वो? साक्षी भी है, और खिलाड़ी भी| अनछुआ भी है, और रेशे-रेशे में मौजूद भी|
नानक कह रहें हैं कि जैसा है परमात्मा, वैसे ही यदि तुम हो सको तो इसी का नाम, ‘भलाई’ है| केंद्र पर अनछुए, और बाहर मौज में| जैसे चारों तरफ उसकी लीला व्याप्त है| जैसे कुछ भी उसके लिये वर्जित नहीं है, और न ही कुछ करणीय है| सतत गतिमान है, बिना हिले| वैसे ही तुम भी हो जाओ|



