काहू से नहि राखिये, काहू विधि की चाह। परम संतोषी हूजिये, रहिये बेपरवाह।।
~ संत चरणदास
आचार्य प्रशांत: सवाल इसमें है कि अगर सत्य की चाह बनी रहती है, पढ़ने की चाह बनी रहती है, तो ये भी तो एक तरह की परवाह है न? अभी बेपरवाही तो आई नहीं?
अजीब भूल-भुलैया है संसार। अनेकों तल हैं इसके, हर तल पिछले तल से ज़्यादा पेंचीदा। जितना आप आगे बढ़ते जाएँगे इस पहेली में, इस भूल-भुलैया में, उतनी ज़्यादा पेंचीदगियाँ बढ़ती जाएँगी। जितना दूर आपका तल है, आपके स्रोत से, उस स्थान से, जहाँ से सब शुरु होता है, जहाँ से आपने भी शुरू किया था; जितना आप उस बिंदु से दूर गए हैं, जितने तलों तक आप आगे चले गए हैं, छिटकते चले गए हैं, पेंचीदगियाँ उतनी ज़्यादा बढ़ती चली जाएँगी।
ज़रा से छिटके आप तो, अभी भूल-भुलैया में बड़े पेंच नहीं हैं, पचासों मार्ग मिलेंगे आपको वापस आने के, सरल सी बात है। आपको ऐसा लगेगा, आप बस टहलने के लिए घर से थोड़ी दूर आ गए; ख़तरे का अभी आपको एहसास भी नहीं होगा। आप कहेंगे, "अरे! जब मन होगा लौट आएँगे, पचासों दरवाज़े हैं इस तल पर तो। मुक्ति सरल है, थोड़ा सा फँस लेने में बुराई क्या है? चलो, स्वाद चख लेते हैं बंधन का; मुक्ति सरल है, पचासों मार्ग है मुक्ति के।"
आप अगले तल पर जाएँगे, पेंचीदगियाँ बढ़ेंगी और साथ ही मुक्ति के रास्ते कुछ कम हो जाएँगे। लेकिन आपका आत्म-विश्वास बढ़ गया है। आप कहेंगे, "ना, फ़र्क नहीं पड़ता, अरे! पिछला वाला था न तल, उसको पार करके यहाँ आ गए हैं। लौटना सहज है, लौटना आसान है, जब चाहेंगे लौट जाएँगे।" और आप एक तल और आगे बढ़ेंगे, और एक तल और आगे बढ़ेंगे और कुछ ही समय में आप पाएँगे कि अब आप ये भी भूल गए हैं कि किस दिशा से आए थे। अब तो आप वापस भी लौटना चाह रहे हैं, तो वापस लौटने की जगह अगले तल पर पहुँच जा रहे हैं; पेंचीदगियाँ बढ़ती जा रही हैं।





