गुरु पंख देगा, पर उड़ना तुमको ही पड़ेगा || योगवासिष्ठ सार पर (2018)

शिक्षण की प्रथागत विधि का अनुसरण केवल परम्परा हेतु होता है। विशुद्ध चैतन्य शिष्य की समझ की स्पष्टता से प्रतिफलित होता है। —योगवासिष्ठ सार
आचार्य प्रशांत: तो यहाँ पर उन्होंने विशुद्ध चैतन्य की ज़िम्मेदारी पूरे तरीक़े से शिष्य की समझ पर डाल दी है। एक जगह वो कह रहे हैं:
परम के दर्शन पावन-ग्रंथों और गुरु की मदद से नहीं हो सकते, स्वयं ही शुद्ध बुद्धि से स्वयं को देखा जाता है। —योगवासिष्ठ सार
आचार्य: यहाँ भी लगता है कि वही बात गूंज रही है जो पिछले श्लोक में थी, कि ग्रन्थ हों कि गुरु हो, परम, यानी आख़िरी मुकाम तक वो नहीं ले जा सकते। वहाँ तक तो स्वयं की मेधा ही ले जाती है।
इनका विरोध आप पाते हैं एक अन्य पद से जो कह रहा है:
जैसे गले में लिपटे आभूषण को विस्मृतिवश खोया मान लिया जाता है और ग़लती का अहसास होते ही पा लिया जाता है, वैसे ही गुरु के शब्दों से स्वयं की प्राप्ति होती है। —योगवासिष्ठ सार
आचार्य: तो यहाँ पर ऐसा बताया है कि जैसे ये सारा दारोमदार, सारा श्रेय गुरु पर है। गुरु के शब्दों से स्वयं की प्राप्ति होती है, गले में लिपटे आभूषण को हम तो विस्मृतिवश खोया मान लेते हैं।

